स्वतंत्र-लेखन, हाजीपुर।
भारत के सौभाग्य-सूर्य के उदय का, हिमालय के भाल पर ज्योतिर्मय तिलक का और राष्ट्र के सबसे अनमोल दिवस का नाम है—पन्द्रह अगस्त। यह केवल तिथि नहीं, भारत की आत्मा के मुक्त होने का वह अमर आलोक-पर्व है, जिसने सदियों की पराधीनता के अंधकार को चीरकर स्वतंत्रता का मंगल प्रभात हमारे जीवन में उतारा। यह स्वतंत्रता-संग्राम की मंजिल थी, पर राष्ट्र-निर्माण की यात्रा का आरम्भ भी यहीं से हुआ था।
ऐसा हो भी क्यों नहीं! विदेशी शासन के उन्मूलन के साथ जुल्म का जनाजा निकला था। उस ऐतिहासिक प्रभात का स्वागत केवल फूलों और दीपों से नहीं हुआ था; मातृभूमि की आरती उन बूढ़े माता-पिताओं के अँधेरे घरों के चिरागों से सजी थी, जिनके लाल रणभूमि में सो गए थे। माँ की माँग का सिंदूर उन वीरों की स्मृति से दमक रहा था, जिनकी जवानी देश के नाम हो गई। बहनों की लाल राखियाँ उन कलाइयों को पुकार रही थीं, जो फिर कभी घर लौटकर नहीं आईं। तब आया वह मंगल प्रभात, जब भारत ने स्वतंत्रता का अमूल्य सौगात पाया।
आज जब पन्द्रह अगस्त का पावन पर्व हमारे द्वार पर दस्तक देता है, तो मन स्वाभाविक रूप से उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों की ओर चला जाता है, जिन्होंने अपने वर्तमान को राष्ट्र के भविष्य के लिए अर्पित कर दिया। उनके लिए स्वतंत्रता कोई राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का अवसर नहीं थी; वह भारत माता की मुक्ति का महायज्ञ था। किसी ने फाँसी का फंदा चूमा, किसी ने कारावास की यातनाएँ सहीं, किसी ने घर-परिवार छोड़ा और किसी ने अपने जीवन की अंतिम साँस तक संघर्ष किया।
उनके त्याग की तुलना किसी सांसारिक उपलब्धि से नहीं की जा सकती। उन्होंने अपने रक्त से स्वतंत्रता की वह इबारत लिखी, जिसे पढ़कर हमारी पीढ़ियाँ स्वाभिमान से सिर उठाती हैं। उनके बलिदान के सामने हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि हम स्वतंत्रता को केवल भोग की वस्तु न समझें, बल्कि उसके मूल्य और मर्यादा को समझें।
आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमने आज़ादी पाई या नहीं; प्रश्न यह भी है कि आज़ादी पाने के बाद हमने क्या पाया और क्या खोया? हमने कितनी दूर यात्रा की और कहाँ-कहाँ अपने मूल आदर्शों से भटक गए? यह प्रश्न किसी सरकार, किसी दल अथवा किसी व्यक्ति से अधिक हम सबके सामने खड़ा है। स्वतंत्रता दिवस इसलिए केवल उत्सव का दिवस नहीं, आत्ममंथन का दिवस भी है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने जिस कठिन यात्रा को पूरा किया है, वह निश्चय ही गौरव का विषय है। जिस देश के सामने कभी अन्न, शिक्षा, उद्योग और आधारभूत सुविधाओं की गंभीर चुनौतियाँ थीं, उसने धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा। कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़े, उद्योगों का विस्तार हुआ, शिक्षा के द्वार खुले और विज्ञान ने नई ऊँचाइयों को छुआ।
आज भारत अंतरिक्ष-विज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रहा है। वैज्ञानिक उपलब्धियाँ देश के आत्मविश्वास को नई शक्ति दे रही हैं। सूचना-प्रौद्योगिकी ने भारतीय प्रतिभा को विश्व के सामने प्रतिष्ठित किया है। सड़क, रेल, संचार, डिजिटल तकनीक और आधारभूत संरचना के विस्तार ने देश के दूर-दराज क्षेत्रों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया है।
हमारे लोकतंत्र ने भी अनेक उतार-चढ़ावों के बीच अपनी यात्रा जारी रखी है। संविधान ने नागरिकों को अधिकार और गरिमा का आधार दिया। जनता ने अपने मत की शक्ति से सरकारों को चुना और बदला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रयोग के रूप में भारत की यह यात्रा स्वयं में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
परन्तु उपलब्धियों का गर्व तभी सार्थक है, जब हम अपनी कमियों को स्वीकार करने का साहस भी रखें। केवल उपलब्धियों की जय-जयकार करते रहना आत्ममुग्धता हो सकती है। स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था; उसका अर्थ गरीबी, अशिक्षा, अन्याय, असमानता और शोषण से भी मुक्ति था। इस कसौटी पर हमारी यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।
आज भी कहीं कोई बच्चा शिक्षा से वंचित है, कहीं कोई परिवार स्वास्थ्य सुविधा के लिए संघर्ष करता है, कहीं किसान अपने श्रम के उचित प्रतिफल की प्रतीक्षा करता है और कहीं युवा अपनी प्रतिभा के अनुरूप अवसर तलाश रहा है। विकास की ऊँची इमारतें तभी सार्थक हैं, जब उनकी छाया में खड़ा अंतिम व्यक्ति भी अपने भविष्य को सुरक्षित अनुभव करे।
यदि तकनीक चाँद तक पहुँच जाए और मनुष्य का मन अपने पड़ोसी तक न पहुँच सके, तो प्रगति अधूरी है। यदि आर्थिक विकास बढ़े, पर सामाजिक संवेदना घटती जाए, तो हमें विकास की दिशा पर पुनर्विचार करना होगा। राष्ट्र की वास्तविक उन्नति उस समय मानी जाएगी, जब विकास के आँकड़ों के साथ नागरिक के चेहरे पर संतोष और आँखों में भविष्य का विश्वास भी दिखाई दे।
इसी आत्ममंथन में राजनीति का प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से सामने आता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति ने लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन समय के साथ सार्वजनिक जीवन में अनेक विकृतियाँ भी दिखाई दी हैं। राजनीति जब सेवा का माध्यम रहती है, तब वह राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बनती है; लेकिन जब वह स्वार्थ, अवसरवाद, पदलिप्सा और व्यक्तिगत हितों से संचालित होने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।
मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक पहचान हैं, मगर मनभेद राष्ट्र के लिए घातक हो सकते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों लोकतंत्र के आवश्यक अंग हैं। दोनों के बीच वैचारिक संघर्ष हो सकता है, पर राष्ट्रहित का साझा आधार कभी नहीं टूटना चाहिए। जनप्रतिनिधि यदि स्वयं को जनता का सेवक समझें, तो राजनीति की गरिमा बढ़ेगी; यदि वे जनता से ऊपर स्वयं को समझने लगें, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।
शहीदों ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें राजनीति त्याग और सेवा का पर्याय थी। उन्होंने सत्ता के लिए संघर्ष नहीं किया था; उन्होंने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था। उनके सामने अपना घर नहीं, पूरा देश था। आज सार्वजनिक जीवन को उसी त्याग, सत्यनिष्ठा, संयम और उत्तरदायित्व की आवश्यकता है।
कुर्सी बड़ी नहीं, देश बड़ा हो,जनता का विश्वास ही सबसे बड़ा हो।
राजनीतिक जीवन की गिरावट का प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। समाज में जब स्वार्थ बढ़ता है, तो सहयोग घटता है; जब ईर्ष्या बढ़ती है, तो प्रतिभा दबती है; जब द्वेष बढ़ता है, तो रिश्तों में दरार आती है। आज आवश्यकता केवल सरकारों को बदलने की नहीं, बल्कि अपने भीतर की मानसिकता बदलने की भी है।
हमें आपसी ईर्ष्या-द्वेष मिटाना होगा। जाति और धर्म की संकीर्ण दीवारों से ऊपर उठकर यह भावना जगानी होगी कि हम सबसे पहले भारतीय हैं। हमारी भाषाएँ अलग हो सकती हैं, हमारी पूजा-पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, हमारी वेशभूषाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी मातृभूमि एक है, हमारा तिरंगा एक है और हमारी राष्ट्रीय पहचान एक है।
समाज और राष्ट्र के बीच खड़ी नफरत की दीवारों को ढहाना होगा। तभी हम उस स्वतंत्रता का वास्तविक रसास्वादन कर सकेंगे, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था। स्वतंत्रता केवल बाहर की बेड़ियाँ तोड़ने का नाम नहीं; मन के भीतर बैठी संकीर्णताओं से मुक्त होना भी स्वतंत्रता है।
रंग अनेक, पर तिरंगा एक,बोलियाँ अनेक, पर भारत एक।
इसी भावना को हमें घर से समाज और समाज से राष्ट्र तक ले जाना होगा। हमारे राष्ट्रीय त्योहार केवल ध्वजारोहण और मिठाई बाँटने के अवसर न बनें; वे आत्मचिन्तन और संकल्प के पर्व बनें। अपने ‘सेनानी-सदन’ से हम सब राष्ट्रीय त्योहार का वंदन करें, उन वीरों को नमन करें जिनके कारण आज हम स्वतंत्र भारत की हवा में साँस ले रहे हैं और नफरत की दीवारें ढहाकर प्रेम-प्रीति का अभिनंदन करें।
राष्ट्रप्रेम केवल सीमा पर खड़े सैनिक का दायित्व नहीं है। ईमानदारी से काम करने वाला शिक्षक भी राष्ट्रसेवक है, अपने खेत में पसीना बहाने वाला किसान भी राष्ट्रसेवक है, अपने दायित्व को निष्ठा से निभाने वाला कर्मचारी भी राष्ट्रसेवक है और ज्ञान, विज्ञान तथा नवाचार से देश को आगे बढ़ाने वाला युवा भी राष्ट्रसेवक है। राष्ट्र निर्माण हर नागरिक की साझी जिम्मेदारी है।
स्वतंत्रता ने हमें अधिकार दिए हैं, तो कर्तव्य भी दिए हैं। कानून का सम्मान करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, पर्यावरण बचाना, स्वच्छता रखना, करों का ईमानदारी से निर्वहन करना और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना—ये सब आधुनिक राष्ट्रभक्ति के ही रूप हैं। तिरंगे को सलामी देना जितना आवश्यक है, उसके सम्मान के अनुरूप आचरण करना उससे कहीं अधिक आवश्यक है।
भविष्य का भारत कैसा होगा, यह केवल सरकारों की योजनाओं से तय नहीं होगा। यह इस बात से तय होगा कि हमारी शिक्षा कैसी है, हमारे संस्कार कैसे हैं, हमारी राजनीति कितनी उत्तरदायी है और हमारी नई पीढ़ी कितनी जागरूक है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो केवल नौकरी पाने का साधन न हो, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम बने।
युवाओं को केवल रोजगार खोजने वाला नहीं, अवसर पैदा करने वाला बनाना होगा। विज्ञान और तकनीक की शक्ति को गाँवों तक पहुँचाना होगा। कृषि को आधुनिक और टिकाऊ बनाना होगा। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे। महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक भागीदारी को विकास की केंद्रीय धुरी बनाना होगा।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा को विकास का विरोधी नहीं, बल्कि विकास की अनिवार्य शर्त मानना होगा। प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़कर कोई भी सभ्यता लंबे समय तक समृद्ध नहीं रह सकती। आने वाली पीढ़ियों को हम केवल इमारतें और सड़कें ही नहीं, स्वच्छ हवा, निर्मल जल और सुरक्षित पर्यावरण भी सौंपें—यह हमारा नैतिक दायित्व है।
भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। इस विविधता को विभाजन का कारण बनाने के बजाय राष्ट्रीय एकता की शक्ति बनाना होगा। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की पहचानें अपनी जगह सम्मानित रहें, लेकिन इनके ऊपर भारतीयता की विराट पहचान सदैव खड़ी रहे।
हमें ऐसा भारत चाहिए जहाँ किसी बच्चे की प्रतिभा गरीबी के कारण न रुके; जहाँ किसान सम्मान से जिए; जहाँ युवा को अपनी योग्यता के अनुरूप अवसर मिले; जहाँ बुजुर्ग अनुभव के कारण सम्मान पाएँ; जहाँ न्याय सामान्य नागरिक के लिए सहज और सुलभ हो; और जहाँ राजनीति विभाजन नहीं, विकास तथा विश्वास की भाषा बोले।
नफरत की आँधी थमनी चाहिए,प्रेम की गंगा बहनी चाहिए;शहीदों की पावन धरती परएकता की ज्योति जलनी चाहिए।
यह भी स्मरण रखना होगा कि स्वतंत्रता की रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं होती। वह विद्यालयों में होती है, जहाँ बच्चों को देश के प्रति जिम्मेदार बनाया जाता है; खेतों में होती है, जहाँ अन्न उगता है; प्रयोगशालाओं में होती है, जहाँ भविष्य का विज्ञान जन्म लेता है; संसद में होती है, जहाँ जनहित की नीतियाँ बनती हैं; और परिवारों में भी होती है, जहाँ अगली पीढ़ी के संस्कार निर्मित होते हैं।
हर ईमानदार कर्म स्वतंत्रता की नींव को मजबूत करता है और हर भ्रष्ट आचरण उस नींव को कमजोर करता है। हर सामाजिक सद्भाव शहीदों के स्वप्न को आगे बढ़ाता है और हर नफरत हमें उस स्वप्न से दूर ले जाती है। इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर हमारा संकल्प केवल एक दिन का नहीं, पूरे जीवन का संकल्प होना चाहिए।
आइए, इस पन्द्रह अगस्त को हम केवल तिरंगा फहराकर न लौटें। कुछ क्षण ठहरें और स्वयं से पूछें—आजादी के बाद हमने क्या पाया और क्या खोया? क्या हमारी उपलब्धियाँ हमारे बलिदानियों के स्वप्न के अनुरूप हैं? क्या हम आने वाली पीढ़ी को ऐसा भारत दे रहे हैं, जिस पर वह गर्व कर सके?
यदि उत्तर कहीं अधूरा दिखाई दे, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं। आत्ममंथन का उद्देश्य दोष गिनना नहीं, सुधार का मार्ग खोजना है। हमें अतीत के गौरव से शक्ति लेनी है, वर्तमान की कमियों से सीखना है और भविष्य के भारत के लिए नई दिशा निर्धारित करनी है।
शहीदों ने अपने रक्त से जो स्वतंत्रता का दीप जलाया था, उसकी लौ कभी मंद नहीं पड़नी चाहिए। वह दीप हमारे घरों में, हमारे विद्यालयों में, हमारे समाज में, हमारे सार्वजनिक जीवन में और सबसे बढ़कर हमारे अंतर्मन में जलता रहना चाहिए।
दीप वही सच्चा दीप है, जो आँधी में भी जलता रहे,देश वही सच्चा देश है, जो सत्य-पथ पर चलता रहे।
आज आवश्यकता है कि हम स्वतंत्रता को केवल अधिकार के रूप में नहीं, उत्तरदायित्व के रूप में देखें। हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल स्वतंत्र भारत की कहानी न सुनाएँ, बल्कि ऐसा भारत बनाने का संकल्प भी दें, जिसमें स्वतंत्रता की आत्मा जीवित रहे।
शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि स्मारकों पर पुष्प चढ़ाने भर से नहीं होगी। वह तब होगी, जब हमारे आचरण में ईमानदारी होगी, हमारे समाज में भाईचारा होगा, हमारी राजनीति में मर्यादा होगी, हमारी अर्थव्यवस्था में समावेशिता होगी और हमारे राष्ट्र-जीवन में मानवता सर्वोपरि होगी।
आइए, उन वीरों के चरणों में नमन करते हुए हम यह प्रण लें कि आज़ादी की मशाल को बुझने नहीं देंगे। अपने भीतर की संकीर्णताओं को जलाएँगे, नफरत की दीवारों को गिराएँगे और प्रेम, प्रीति, सद्भाव तथा भारतीयता की नई रोशनी फैलाएँगे।
पन्द्रह अगस्त का यह मंगल पर्व हमें बार-बार याद दिलाए कि स्वतंत्रता प्राप्त करना इतिहास की उपलब्धि थी, लेकिन स्वतंत्रता के मूल्यों को बचाए रखना वर्तमान की जिम्मेदारी और भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती है।
अतः आज भारत माता के चरणों में यही विनम्र वंदन, यही अभिनंदन और यही संकल्प—
शहीदों ने आज़ादी के जो दीप जलाए, वह सतत जलना चाहिए।आज़ादी के बाद हमने क्या खोया, क्या पाया—इसका मूल्यांकन होना चाहिए।
यही स्वतंत्रता दिवस की सच्ची सार्थकता है, यही बलिदानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है और यही आने वाले भारत के प्रति हमारा सबसे पवित्र राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए।






