विश्वकर्मा पूजन : शिल्प से विज्ञान तक भारतीय ज्ञान परम्परा का अद्भुत संगम
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमारमिश्र भारतीय संस्कृति में प्रत्येक उत्सव केवल सामाजिक अथवा धार्मिक आयोजन नहीं होता, अपितु उसके भीतर गहन वैज्ञानिकता, शास्त्रीय चिंतन और मानव मनोविज्ञान की सूक्ष्म समझ निहित रहती है। विश्वकर्मा पूजन भी ऐसा ही पर्व है, जिसमें सृष्टि,…
ब्रिक्स सम्मेलन संघर्षों के बीच संवाद की डिप्लोमेसी
संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़ नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के 18वें सम्मेलन में भारत की कूटनीति की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने संघर्षों के बीच संवाद की संभावना को जीवित रखा। भारत ने ब्रिक्स को किसी देश के…
हिंदी भाषा पर अवलंबित वैश्विक अर्थतंत्र,हिंदी बनी व्यावसायिक
संजीव ठाकुर, रायपुर, छत्तीसगढ़ डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा है कि हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द या भाषा का तिरस्कार नहीं किया। और यही तथ्य हिंदी भाषा के गौरव को…
शराबबंदी का धर्मसंकट – पीने वालों के लिए मायूसी, तस्करों के लिए उम्मीद का नया दरवाजा?
जितेन्द्र कुमार सिन्हपटना बिहार में शराब चाहने वालों के लिए यह समय निश्चित रूप से निराशा का है, लेकिन शराब की तस्करी करने वालों के लिए शायद खुशी का सागर है। पिछले कुछ महीनों से शराबबंदी को लेकर जिस…
नेहा झा प्रकरण : 75 लीटर शराब से बड़ा सवाल—मजबूरी, परिवार या शराबबंदी की व्यवस्था में सेंध?
नीरव समदर्शी बिहार में शराबबंदी को लेकर सरकार की नीति और उसके क्रियान्वयन पर बहस कोई नई बात नहीं है। लेकिन समस्तीपुर में स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस के प्रथम श्रेणी वातानुकूलित कोच से 25 वर्षीय नेहा झा के पास…
एच-1बी वीजा पर अमेरिका का 1.03 लाख डॉलर शुल्क का प्रस्ताव
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले दुनिया भर के कुशल पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा लंबे समय से सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक रहा है। खासकर भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीकी…
साहित्य-जगत ने आज खो दिया जीवंत साहित्यिक चेतना
जनचेतना के प्रखर कवि थे बिहार राज्यगीत रचयिता कविवर सत्यनारायण डॉ. ध्रुव कुमार लेखक -पत्रकार कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं होती। वह समय की धड़कन, समाज की बेचैनी और मनुष्य के भीतर बची हुई उम्मीद की आवाज भी होती…
नैतिक चेतना का होता क्षरण
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना मानवीय जीवन में सफलता, पद, प्रतिष्ठा और पैसा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये जीवन को सुविधाजनक बनाते हैं, सामाजिक पहचान देते हैं और व्यक्ति के सपनों को पूरा करने में सहायक होते हैं। लेकिन इन…
गाली का इतिहास पुराना है, फिर Gen-Z ही कटघरे में क्यों?
—-नीरव समदर्शी आज आजादी के 79 वर्ष बाद भी जब प्रधानमंत्री के विरुद्ध किसी सार्वजनिक मंच से आपत्तिजनक शब्द बोले जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक असहमति की कोई मर्यादा नहीं रह गई? क्या…
स्याही ने नेहा का चेहरा नहीं, हमारी राजनीतिक संस्कृति का चेहरा काला किया है
—-नीरव समदर्शी विचारों से असहमति लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक और आवश्यक शर्त है। किसी व्यक्ति की विचारधारा से असहमत होना अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज में यह नागरिक अधिकार है। किसी छात्र नेता के विचार हमें पसंद न हों,…
*विज्ञान की चेतावनी और मानव भविष्य – “चांद की सतह पर उभरती नई दरारें
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि चांद एक ठंडा, मृत और भूगर्भीय रूप से निष्क्रिय पिंड है। पृथ्वी की तुलना में उसका छोटा आकार, वातावरण का अभाव और अरबों वर्षों से लगभग अपरिवर्तित…
पक्षपातपूर्ण निर्णयों को भी वाजिब ठहराने में माहिर खिलाड़ी—नीतीश कुमार
——-नीरव समदर्शी भागलपुर में हाल ही में अडानी ग्रुप को एक रुपये वार्षिक लीज पर 1050 एकड़ जमीन देने का मामला जबरदस्त विवाद का कारण बना। अब इसी कड़ी में बिहार सरकार ने रोजगार सृजन और बड़े पैमाने पर…












