—-नीरव समदर्शी
आज आजादी के 79 वर्ष बाद भी जब प्रधानमंत्री के विरुद्ध किसी सार्वजनिक मंच से आपत्तिजनक शब्द बोले जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक असहमति की कोई मर्यादा नहीं रह गई? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ किसी व्यक्ति, पद या परिवार के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना है? निश्चित रूप से नहीं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, आलोचना का अधिकार है, सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का अधिकार है, व्यंग्य, कार्टून, पोस्टर और नारे तक लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के प्रभावी माध्यम हैं; लेकिन किसी व्यक्ति को गाली देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनिवार्य पर्याय नहीं हो सकता।
लेकिन इसी के साथ दूसरा प्रश्न भी उतनी ही ईमानदारी से पूछा जाना चाहिए—क्या राजनीतिक गाली-गलौज और व्यक्तिगत अपमान की संस्कृति आज की Gen-Z ने पैदा की है?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए इतिहास को सुविधानुसार भूलना उचित नहीं होगा।
भारत में राष्ट्रपति को प्रोटोकॉल और सार्वजनिक जीवन की भाषा में “प्रथम नागरिक” कहा जाता है। राष्ट्रपति संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष हैं। राज्यपाल राज्यों में संवैधानिक प्रमुख हैं और उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं। इन पदों पर बैठे लोगों की आलोचना नहीं करने की परम्परा अब तक निभती आ रही है। इसके अतिरिक्त सभी पदों पर बैठे आलोचना से ऊपर नहीं हैं या उनके विरुद्ध बोलना कानूनन अपराध नहीं है। संविधान नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। हाँ, मानहानि, धमकी, हिंसा के लिए उकसाना, सार्वजनिक व्यवस्था आदि से जुड़े कानूनों की सीमाएँ अलग विषय हैं।
यानी लोकतंत्र में पद की गरिमा और व्यक्ति की आलोचना—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। प्रधानमंत्री की आलोचना लोकतंत्र-विरोधी नहीं है और प्रधानमंत्री को कठोर शब्दों में घेरना अपने-आप में अपराध नहीं है। इसी तरह प्रधानमंत्री की माँ, विपक्ष के नेता की माँ या किसी राजनीतिक व्यक्ति के परिवार को गाली देना भी लोकतांत्रिक अधिकार का पर्याय नहीं बनाया जा सकता।
यहीं से वर्तमान बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है।
आज की युवा पीढ़ी को संस्कारहीन, भटकी हुई, स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वाली और राजनीतिक अशालीनता की जनक बताने से पहले 1974–75 के जेपी आंदोलन की भाषा को भी याद करना होगा।
उस आंदोलन की वैचारिक ऊँचाई पर कोई प्रश्न नहीं। भ्रष्टाचार, महँगाई, बेरोजगारी और सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण ने जिस “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया, वह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी। लेकिन किसी भी विशाल जनांदोलन की भीड़ को केवल उसके शीर्ष नेतृत्व की भाषा से नहीं समझा जा सकता। जुलूसों, दीवारों, तख्तियों और नुक्कड़ सभाओं में जनता की अपनी भाषा भी होती है।
इंदिरा गांधी के खिलाफ उस दौर में “इंदिरा गांधी गद्दी छोड़ो”, “इंदिरा हटाओ, देश बचाओ” और “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” जैसे तीखे राजनीतिक नारे प्रचलित थे। ये असभ्य नहीं थे, लेकिन सत्ता के शीर्ष व्यक्ति को सीधे निशाना बनाने वाले नारे अवश्य थे।
इसके आगे भी बात जाती थी। बिहार आंदोलन से जुड़े पुराने विवरणों में “देखो यह इंदिरा का खेल, खा गई शक्कर, पी गई तेल” जैसे व्यंग्यात्मक नारे दर्ज हैं। कुछ स्रोत “गाय हमारी माता है, गफूर उसको खाता है” जैसे अत्यंत आपत्तिजनक और सांप्रदायिक नारे को भी उस दौर से जोड़ते हैं। लेकिन इस दूसरे नारे को लेकर आंदोलन के पुराने सहभागियों में मतभेद भी हैं और इसे पूरे जेपी आंदोलन का अधिकृत नारा कहना उचित नहीं होगा।
यही अंतर समझना जरूरी है।
जेपी स्वयं अपमानजनक भाषा के समर्थक नहीं थे। आंदोलन से जुड़े लोगों के संस्मरणों में यह बात सामने आती है कि वे इंदिरा गांधी या तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के खिलाफ अपमानजनक नारे पसंद नहीं करते थे। अर्थात उस समय भी राजनीतिक अशालीनता थी और उसके विरुद्ध आंदोलन के भीतर से आवाज भी थी।
यही तो आज के विमर्श का असली बिंदु है।
अगर आज की Gen-Z के किसी हिस्से द्वारा प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र भाषा इस्तेमाल किए जाने को देखकर पूरी पीढ़ी को संस्कारहीन घोषित किया जा सकता है, तो फिर 1974–75 की पूरी पीढ़ी को भी उसके समय के हर अशालीन नारे का प्रतिनिधि मानना पड़ेगा। यहां यह याद रखना भी जरुरी है कि आज कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे अधिकतर कद्दावर नेता प्रधानमंत्री समेत उसी आंदोलन से अपनी राजनीति जमीन तैयार किए आज के 75 वर्षीय नेता तब के जेन जी थे।लेकिन ऐसा करना गलत होगा। जिस तरह आज के युवाओं के एक वर्ग की भाषा से पूरी Gen-Z को परिभाषित नहीं किया जा सकता, उसी तरह जेपी आंदोलन के किसी अशोभनीय नारे से पूरा आंदोलन भी परिभाषित नहीं किया जा सकता।
मै तो तब बहुत छोटा था 5 वर्ष से कम का ही था शायद किन्तु उसकी स्मृति आज भी है जिसे कइतिहास की एक सामग्री माना जाना चाहिए। मैंने स्वयं उन दिनों जुलूसों में तख्तियाँ देखीं, दीवारों पर लिखे नारे देखे और ऐसे नारे सुने हैं जिनका आज किसी डिजिटल अभिलेख में मिल जाना आवश्यक नहीं। “हम जेपी के बच्चे हैं, इंदिरा तुमसे अच्छे हैं” जैसे नारे आंदोलन की स्थानीय और मौखिक स्मृति का हिस्सा रहे। “रूसी बिल्ली, दिल्ली छोड़ो, इटली जाकर होटल खोलो” जैसे नारे भी इसी मौखिक राजनीतिक संस्कृति की स्मृति में मौजूद हैं। इनके तत्कालीन मूल पोस्टर या अखबारी प्रमाण उपलब्ध न हों तो इन्हें प्रमाणित दस्तावेज नहीं, बल्कि प्रत्यक्षदर्शी स्मृति के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
इतिहास का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आज के राजनीतिक नेतृत्व में भी अपमानजनक राजनीतिक भाषा के उदाहरण मिलते रहे हैं। नरेंद्र मोदी द्वारा सोनिया गांधी के लिए “जर्सी गाय” जैसे शब्दों के इस्तेमाल का उल्लेख अनेक समकालीन राजनीतिक रिपोर्टों में हुआ है। 2018 के आजतक के एक कार्यक्रम में कांग्रेस प्रवक्ता ने भाजपा प्रवक्ता के सामने इसी टिप्पणी को लेकर सवाल उठाया था। 2023 में भी ABP सहित कई समाचार माध्यमों ने मोदी के पुराने “जर्सी गाय” और “कांग्रेस की विधवा” जैसे कथित संबोधनों को राजनीतिक बहस में उद्धृत किया। (AajTakABP News )
इसका अर्थ यह नहीं कि इससे आज किसी प्रधानमंत्री को गाली देने को उचित ठहराया जा सकता है। गलत भाषा का उत्तर गलत भाषा नहीं हो सकता। लेकिन यदि वर्तमान अशालीनता पर विमर्श हो रहा है तो इतिहास की पूरी किताब खोलनी होगी, केवल आज का एक पन्ना नहीं।
और यहां एक तथ्यात्मक सावधानी भी जरूरी है। वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल के प्रत्येक सदस्य को 1974 के आंदोलन का सक्रिय आंदोलनकारी कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। लेकिन नरेंद्र मोदी उस समय युवा RSS कार्यकर्ता थे और आपातकाल के दौरान भूमिगत गतिविधियों से जुड़े रहे; लेकिन अमित शाह 1975 में लगभग 11 वर्ष के थे। उस वक़्त जुलुस के पीछे ही सही किन्तु उस उम्र के बच्चे भी उस आंदोलन कका हिस्सा बने थे।यह ठीक है की आज की सत्ता में बड़ी संख्या में तत्कालीन कौग्रेसी बहुत भी भी है बावजूद इसकी सत्ता पर मजबूत पकड़ 74आंदोलन के उपजे नेता की ही है।वर्तमान सत्ता-व्यवस्था को “जेपी आंदोलन की सक्रिय आंदोलनकारी पीढ़ी” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
व्यापक राजनीतिक परंपरा का प्रश्न फिर भी है।
आज की अशालीनता का ईमानदार समाधान यह नहीं कि पूरी Gen-Z को संस्कारहीन घोषित कर दिया जाए। समाधान यह है कि राजनीतिक दल, नेता, मीडिया, सोशल मीडिया और समाज—सभी अपने भीतर देखें कि राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत अपमान में बदलने की संस्कृति कहाँ से आती है।
प्रधानमंत्री की माँ के बारे में अपमानजनक टिप्पणी गलत है। उसी तरह प्रधानमंत्री द्वारा विपक्षी नेता के परिवार के किसी सदस्य को अपमानजनक उपमा देना भी गलत है। मर्यादा का पैमाना सत्ता और विपक्ष के लिए अलग-अलग नहीं हो सकता।
लोकतंत्र में प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि गाली किसने दी—हमारे पक्ष ने या विरोधी पक्ष ने? प्रश्न होना चाहिए कि गाली राजनीतिक विमर्श का हिस्सा क्यों बन रही है?
आज के युवा को केवल इसलिए दोषी ठहराना कि उसके हाथ में मोबाइल है और उसकी भाषा सोशल मीडिया पर तुरंत दिखाई देती है, इतिहास से आँखें मूँदना है। पहले भी नारों की भाषा तीखी थी, पहले भी दीवारें राजनीतिक गुस्से से भरी थीं, पहले भी नेताओं और परिवारों को निशाना बनाया जाता था। फर्क इतना है कि तब किसी जुलूस का नारा अगले दिन के अखबार तक सीमित रह सकता था; आज वही शब्द कुछ सेकंड में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाते हैं।
इसलिए आज की चुनौती केवल Gen-Z की नहीं है। यह पूरे समाज की चुनौती है।
युवा को अभद्रता से बचना चाहिए, लेकिन उसे यह पाठ पढ़ाने वालों को भी अपने राजनीतिक इतिहास की किताब खोलनी होगी। अगर लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार बचाना है तो आलोचना और गाली के बीच फर्क करना होगा। और अगर राजनीतिक भाषा को मर्यादित बनाना है तो इसकी शुरुआत सत्ता से भी होनी चाहिए और समाज से भी।
क्योंकि लोकतंत्र में असहमति संस्कारहीनता नहीं है, आलोचना राष्ट्रविरोध नहीं है और प्रश्न पूछना विद्रोह नहीं है। लेकिन किसी व्यक्ति को गाली देना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पर्याय नहीं है।
Gen-Z को कटघरे में खड़ा करने से पहले भारतीय राजनीति को अपना आईना देखना होगा। यही इस बहस का वास्तविक आरंभ है।




