—-नीरव समदर्शी
विचारों से असहमति लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक और आवश्यक शर्त है। किसी व्यक्ति की विचारधारा से असहमत होना अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज में यह नागरिक अधिकार है। किसी छात्र नेता के विचार हमें पसंद न हों, उसके संगठन की कार्यशैली से हमारी सख्त असहमति हो, उसके राजनीतिक आग्रह हमें देशहित के विपरीत दिखाई दें—इन सबके बावजूद उसके विरोध का अधिकार उतना ही सुरक्षित रहना चाहिए, जितना हमारे अपने विचार रखने का अधिकार।
लेकिन रांची में नेहा बोरा पर स्याही फेंके जाने की घटना ने इसी बुनियादी प्रश्न को हमारे सामने ला खड़ा किया है—क्या अब हम विचार का उत्तर विचार से नहीं, व्यक्ति के अपमान से देने लगे हैं?
7 अगस्त को झारखंड में छात्रों के आंदोलन के दौरान नेहा बोरा पर स्याही फेंकी गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरोपी युवक को हिरासत में लिया गया और उसने नेहा को एक विशेष विचारधारा से जोड़ते हुए अपने कृत्य को उचित ठहराने की कोशिश की।
मान लीजिए, नेहा बोरा की विचारधारा से किसी को घोर असहमति है। मान लीजिए, उनके राजनीतिक विचारों से देश का एक बड़ा वर्ग असहमत है। यह भी मान लिया जाए कि उनके द्वारा किसी व्यक्ति, संगठन या सत्ता के विरुद्ध कही गई किसी बात को अनुचित माना जाता है। तब भी सवाल यही रहेगा—क्या स्याही फेंकना उस असहमति का लोकतांत्रिक उत्तर हो सकता है?
उत्तर स्पष्ट होना चाहिए—नहीं।
क्योंकि लोकतंत्र में व्यक्ति को उसके विचारों के लिए चुनौती दी जा सकती है, उसके तर्क का प्रतिवाद किया जा सकता है, उसके भाषण की आलोचना की जा सकती है, उसके संगठन की नीतियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं। लेकिन उसके चेहरे पर स्याही फेंककर हम उसके विचार को नहीं हराते; हम केवल अपने भीतर की असहिष्णुता को सार्वजनिक करते हैं।
और यहां प्रश्न केवल नेहा बोरा का नहीं है। प्रश्न उस संस्कृति का है, जिसे हम अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं।
हम बार-बार कहते हैं कि भारत की संस्कृति महिलाओं का सम्मान करना सिखाती है। फिर यह सम्मान केवल तब क्यों याद आता है, जब महिला हमारी विचारधारा की हो?
बेटी किसी विचारधारा की नहीं होती। बेटी समाज की होती है।
वह चाहे वामपंथी विचार रखे, दक्षिणपंथी विचार रखे, उदारवादी हो, राष्ट्रवादी हो, सत्ता की समर्थक हो या सत्ता की मुखर आलोचक—उसकी गरिमा का अधिकार उसकी विचारधारा से निर्धारित नहीं हो सकता।
यही लोकतंत्र का न्यूनतम संस्कार है।
नेहा बोरा से असहमति रखने वालों को उनके विचारों का जवाब देना चाहिए। उनके तर्कों को चुनौती देनी चाहिए। उनके भाषणों की आलोचना करनी चाहिए। यदि उन्होंने कोई कानून तोड़ा है तो कानून अपना रास्ता अपनाए। लेकिन किसी नागरिक को केवल उसकी विचारधारा के कारण सार्वजनिक रूप से अपमानित करना उस विचारधारा को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसके समर्थकों को पीड़ित होने का नैतिक आधार दे देता है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि राजनीतिक समाज में अब चयनात्मक नैतिकता तेजी से जगह बना रही है।
जब हमारे विरोधी के समर्थक गाली देते हैं तो हम उसे लोकतंत्र का पतन कहते हैं। जब हमारे पक्ष का व्यक्ति वही करता है तो हम उसे आक्रोश, प्रतिक्रिया या भावनात्मक स्वाभाविकता कहकर बचाने लगते हैं।
यहीं से लोकतांत्रिक चरित्र का पतन शुरू होता है।
आज यदि नेहा पर स्याही फेंकने वाले के कृत्य को यह कहकर उचित ठहराया जाता है कि वह किसी विशेष विचारधारा के विरोध में था, तो कल कोई दूसरी विचारधारा का व्यक्ति किसी और महिला के साथ इसी तरह का व्यवहार करेगा और अपने कृत्य के लिए वही तर्क देगा।
फिर अंतर क्या रह जाएगा?
अगर अपमान का औचित्य विचारधारा तय करने लगे, तो संविधान की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी?
लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि हम अपने पसंदीदा लोगों की रक्षा करें और विरोधियों के अपमान पर चुप रहें। लोकतंत्र का असली परीक्षण तब होता है जब सामने वाला वह बोल रहा हो, जिसे सुनना हमें बिल्कुल पसंद नहीं।
यही कारण है कि नेहा बोरा पर स्याही फेंकने की घटना को केवल एक व्यक्ति की हरकत मानकर भूल जाना पर्याप्त नहीं होगा।
यह उस मानसिकता का संकेत है, जो कहती है—जिससे असहमत हो, उसे बोलने मत दो; बोल दे तो अपमानित करो; और अपमान भी कम पड़े तो उसे देशद्रोही घोषित कर दो।
यह रास्ता लोकतंत्र का नहीं, भीड़तंत्र का रास्ता है।
और अगर हम सचमुच अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भारत चाहते हैं, तो हमें यह तय करना होगा कि विचारधारा की लड़ाई विचारों से होगी या स्याही, गाली और अपमान से।
गाली का उत्तर गाली नहीं, गरिमा होनी चाहिए
यहां से सवाल और बड़ा हो जाता है।
आज देश की राजनीति में गाली और अपमान की भाषा को लेकर खूब बहस होती है। प्रधानमंत्री को गाली दी जाती है तो देश के लोकतांत्रिक संस्कारों पर संकट बताया जाता है। किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य पर अभद्र टिप्पणी होती है तो संस्कृति, संस्कार और मर्यादा की दुहाई दी जाती है।
दुहाई दी जानी भी चाहिए।
लेकिन वही कसौटी हर व्यक्ति के लिए होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री देश के नागरिक हैं तो उनकी मां भी मां हैं। किसी दूसरे नेता की मां मां हैं तो प्रधानमंत्री की मां भी मां हैं।
मां की गरिमा का कोई राजनीतिक संस्करण नहीं हो सकता।
यदि किसी राजनीतिक मंच से किसी सम्मानित महिला के लिए ऐसी उपमा का इस्तेमाल किया गया, जिसे सामान्य सामाजिक मर्यादा स्वीकार नहीं करती, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए—चाहे वह नेता किसी भी दल का हो। यदि किसी केंद्रीय मंत्री द्वारा सदन में किसी महिला के प्रति अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया गया हो, तो उस पर भी वही नैतिक प्रश्न उठना चाहिए। सत्ता में होना किसी को शब्दों की छूट नहीं देता।
सत्ता का पद जितना बड़ा होता है, सार्वजनिक भाषा की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।
लेकिन इसके साथ दूसरी बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यदि सत्ता पक्ष की भाषा गलत है तो उसका उत्तर विपक्षी युवाओं को गाली सिखाकर नहीं दिया जा सकता। यदि किसी मंत्री की भाषा अमर्यादित है तो उसका प्रतिकार करने के नाम पर प्रधानमंत्री या उनके परिवार के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी सही नहीं हो सकता।
गलत भाषा का जवाब गलत भाषा नहीं हो सकता।
और यहीं आज की राजनीति अपने सबसे कठिन प्रश्न के सामने खड़ी है।
जिस सोशल मीडिया तंत्र को राजनीतिक दलों ने अपनी शक्ति का हथियार बनाया, उसने राजनीति को संवाद से अधिक युद्ध बना दिया है। ट्रोल सेना, मीम, कटाक्ष, अपमान, गाली और चरित्र पर हमले—इन सबने मिलकर राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने का काम किया है।
फिर हम आश्चर्य करते हैं कि युवा गाली क्यों देते हैं?
बच्चे अचानक गाली नहीं सीखते। वे समाज से सीखते हैं। परिवार से सीखते हैं। विद्यालय से सीखते हैं। मित्रों से सीखते हैं। और आज सबसे तेजी से वे सोशल मीडिया से सीखते हैं।
इसलिए जब किसी युवा के मुंह से प्रधानमंत्री, गृह मंत्री या किसी राजनीतिक नेता के लिए अपशब्द निकलते हैं, तो केवल उस बच्चे से सवाल करना पर्याप्त नहीं है।
सवाल यह भी है कि उसे यह भाषा मिली कहां से?
क्या हमने उसे बहस करना सिखाया या विरोधी को नीचा दिखाना?
क्या हमने उसे तर्क करना सिखाया या ट्रोल करना?
क्या हमने उसे असहमति व्यक्त करना सिखाया या भीड़ के साथ नारे लगाकर व्यक्ति को अपमानित करना?
आज के बच्चे कल का भारत हैं। यदि उन्हें यह सिखाया जा रहा है कि अपने विरोधी को गाली देना राष्ट्रवाद है, तो हम कैसी राजनीतिक पीढ़ी तैयार कर रहे हैं?
और यही बात नेहा बोरा के मामले में भी लागू होती है।
उनके विचार गलत हैं तो तर्क से गलत सिद्ध कीजिए। उनके भाषण में तथ्यात्मक त्रुटि है तो तथ्य सामने रखिए। उनकी विचारधारा देशहित के विपरीत लगती है तो संविधान के भीतर रहकर उसका प्रतिवाद कीजिए। उनके संगठन की नीति से असहमति है तो जनता के सामने उसकी आलोचना कीजिए।
लेकिन स्याही फेंककर आप नेहा को नहीं हराते।
आप केवल यह साबित करते हैं कि आपके पास उनके विचार का उत्तर देने के लिए पर्याप्त तर्क नहीं था।
और अगर कोई यह कहे कि स्याही तो केवल स्याही है, कोई बड़ी हिंसा तो नहीं हुई, तो यह तर्क भी खतरनाक है। समाज में अमर्यादित व्यवहार की सीमा एक दिन में हिंसा तक नहीं पहुंचती। पहले अपमान सामान्य होता है, फिर धक्का सामान्य होता है, फिर हमला सामान्य होता है और अंततः हिंसा को भी विचारधारा के नाम पर सही ठहराया जाने लगता है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि स्याही से कितना नुकसान हुआ।
सवाल यह है कि हमने समाज की मर्यादा को कितना नुकसान पहुंचाया।
सनातन संस्कृति का अर्थ केवल अपने धार्मिक प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं है। उसमें सहिष्णुता, संयम, अतिथि-सत्कार, स्त्री सम्मान, आत्मसंयम और विरोधी के प्रति भी मानवीय व्यवहार जैसी अनेक परंपराएं हैं।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति अपने को सनातनी कहता है तो उसके सामने सबसे बड़ी परीक्षा तब नहीं होती जब वह अपने समर्थक का सम्मान करे। परीक्षा तब होती है जब उसके सामने उसका वैचारिक विरोधी खड़ा हो।
क्या वह तब भी मर्यादा रख सकता है?
यदि हां, तो संस्कृति जीवित है।
यदि नहीं, तो केवल नारे बचते हैं, संस्कृति नहीं।
नेहा बोरा की विचारधारा से असहमति रखने वालों को असहमति का पूरा अधिकार है। उसी तरह नेहा और उनके साथियों को भी अपने विचार रखने का अधिकार है। लोकतंत्र का सौंदर्य इसी टकराव में है।
लेकिन यह टकराव विचारों का होना चाहिए, चेहरों का नहीं।
आज नेहा पर स्याही फेंकी गई है। कल कोई दूसरी विचारधारा की लड़की निशाना बन सकती है। परसों कोई पत्रकार, छात्र, नेता या सामान्य नागरिक।
यदि हमने आज यह नहीं कहा कि गलत, गलत है—चाहे गलत करने वाला हमारा ही क्यों न हो, तो कल अपने पक्ष के व्यक्ति के लिए भी न्याय की नैतिक जमीन हमारे पास नहीं बचेगी।
इसलिए नेहा बोरा पर स्याही फेंकने वाले से सवाल होना चाहिए, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल हम सबके सामने होना चाहिए—
क्या हम अपने बच्चों को ऐसा भारत दे रहे हैं, जहां असहमति का जवाब तर्क से मिलेगा या स्याही से?
क्योंकि लोकतंत्र में विचार हार सकते हैं, सरकारें बदल सकती हैं, नेता बदल सकते हैं और विचारधाराएं भी बदल सकती हैं।
लेकिन यदि समाज ने मर्यादा खो दी, तो उसे वापस पाने में पीढ़ियां लग सकती हैं।
बेटियां विचारधारा से बड़ी होती हैं।
संविधान सत्ता से बड़ा होता है।
और मर्यादा—हर राजनीतिक जीत से बड़ी। नहीं; विचारधारा से असहमति हो, लेकिन महिला की गरिमा से नहीं”—को केंद्र में रखता है और सत्ता-विपक्ष दोनों के लिए एक समान नैतिक कसौटी रखता है।






