संजीव ठाकुर
रायपुर छत्तीसगढ़
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल मीडिया के लाभ हैं, लेकिन अत्यधिक या अनुचित उपयोग नींद, शारीरिक गतिविधि और भावनात्मक-सामाजिक विकास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए केवल स्क्रीन के घंटे गिनने के बजाय यह देखना जरूरी है कि बच्चा क्या देख रहा है, कब देख रहा है और उसकी वजह से कौन-सी स्वस्थ गतिविधियाँ छूट रही हैं।मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समस्या केवल मोबाइल हाथ में होने की नहीं है। समस्या तब गंभीर होती है जब बच्चा मोबाइल के बिना बेचैन हो, पढ़ाई और खेल में रुचि खोने लगे, परिवार से संवाद कम कर दे, रात में देर तक जागे अथवा वास्तविक दुनिया की तुलना में आभासी दुनिया को अधिक महत्वपूर्ण मानने लगे। आज का मनुष्य तकनीक के ऐसे युग में प्रवेश कर चुका है, जहाँ मोबाइल केवल बातचीत का माध्यम नहीं रहा, कंप्यूटर केवल काम करने का उपकरण नहीं रहा और इंटरनेट केवल जानकारी प्राप्त करने का साधन नहीं रहा। ये सब धीरे-धीरे हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक मोबाइल की स्क्रीन हमारे साथ रहती है। बच्चों के हाथों में मोबाइल है, युवाओं के सामने सोशल मीडिया है और बुजुर्गों के पास अक्सर अकेलेपन को भरने के लिए टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट हैं।
तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन प्रश्न यह है कि कहीं सुविधा धीरे-धीरे हमारी संवेदना और मानसिक शांति की कीमत पर तो नहीं आ रही?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अकेलापन और सामाजिक अलगाव आज एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुके हैं। दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव करता है। बुजुर्गों में अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारक है।
आज बहुत से बच्चों के खेल का मैदान मोबाइल की स्क्रीन बन गया है। मिट्टी में खेलने, पेड़ के नीचे बैठने, दोस्तों के साथ दौड़ने और परिवार के बुजुर्गों से कहानियाँ सुनने की जगह मोबाइल गेम, वीडियो और सोशल मीडिया ने ले ली है।
बच्चे जितनी जल्दी डिजिटल दुनिया से जुड़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से उनके जीवन से कुछ प्राकृतिक गतिविधियाँ कम होती जा रही हैं। शारीरिक खेल, रचनात्मक गतिविधियाँ, प्रत्यक्ष संवाद और प्रकृति के साथ समय बिताना बच्चे के भावनात्मक तथा सामाजिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
विडंबना देखिए सोशल मीडिया ने हमें हजारों लोगों से जोड़ दिया, लेकिन कभी-कभी अपने ही घर के लोगों से दूर कर दिया। एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देते हैं। परिवार साथ है, लेकिन संवाद अनुपस्थित है। बच्चे माता-पिता से बात करने के बजाय स्क्रीन से बात कर रहे हैं और माता-पिता बच्चों की बात सुनने के बजाय स्वयं मोबाइल में व्यस्त हैं।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने माता-पिता के अत्यधिक डिजिटल उपयोग से उत्पन्न उस स्थिति की ओर भी ध्यान दिलाया है जिसमें माता-पिता की डिजिटल व्यस्तता बच्चों के साथ मौखिक और भावनात्मक संवाद को कम कर देती है। इसे ‘टेक्नोफेरेंस’ कहा जाता है।बच्चे को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि ‘मोबाइल छोड़ दो’। यदि माता-पिता स्वयं लगातार मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चे को स्वस्थ डिजिटल व्यवहार का आदर्श कहाँ से मिलेगा?
दूसरी ओर हमारे बुजुर्गों की समस्या अलग है। परिवार छोटे होते गए, संयुक्त परिवार टूटते गए, बच्चे रोजगार और शिक्षा के कारण दूर चले गए और बुजुर्ग कई बार अपने ही घर में अकेले रह गए।
ऐसे में मोबाइल और टेलीविजन उनका साथी बन जाते हैं। वे समाचार देखते हैं, धार्मिक कार्यक्रम देखते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो देखते हैं और घंटों मोबाइल चलाते हैं। यह उपयोग हमेशा बुरा नहीं है। डिजिटल माध्यम दूर बैठे बच्चों और रिश्तेदारों से संपर्क बनाए रखने का अच्छा माध्यम भी बन सकता है। लेकिन जब स्क्रीन वास्तविक संवाद का विकल्प बन जाए और व्यक्ति दिन का अधिकांश समय समाचार, वीडियो या सोशल मीडिया में बिताने लगे, तब समस्या पैदा होती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सामाजिक संबंध मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बुजुर्गों में सामाजिक अलगाव और अकेलापन अवसाद तथा अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को बढ़ा सकते है विश्व स्वास्थ्य संगठन के जुलाई 2026 के तथ्य-पत्र के अनुसार लगभग 15 प्रतिशत 70 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क किसी ना किसी मानसिक विकार के साथ जीवन जीते हैं। इसलिए बुजुर्गों के हाथ से मोबाइल छीन लेना समाधान नहीं है; उनके हाथ को किसी अपने हाथ से जोड़ना समाधान है। स्क्रीन नहीं, संबंध बढ़ाइए। इस समस्या का समाधान तकनीक का पूर्ण बहिष्कार नहीं है। आज के युग में इंटरनेट से पूरी तरह दूर रहना न संभव है और न आवश्यक। आवश्यकता है—डिजिटल अनुशासन और मानवीय संबंधों के संतुलन की।बच्चों के लिए परिवार बनाए डिजिटल नियम
घर में फैमिली मीडिया प्लान बनाया जा सकता है। इसमें तय हो कि मोबाइल कब चलेगा, कहाँ चलेगा और किन परिस्थितियों में नहीं चलेगा। एप भी परिवार की परिस्थितियों और बच्चे की उम्र के अनुसार व्यक्तिगत मीडिया योजना बनाने की सलाह देता है।
भोजन के समय मोबाइल उपयोग की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
इसी तरह पढ़ाई के समय मनोरंजनात्मक स्क्रीन का उपयोग भी मानसिक तनाव को बढ़ाता है
बच्चे के शयनकक्ष में मोबाइल और अन्य मनोरंजन उपकरण रखने की सलाह नहीं दी जाती है इन नियमों का पालन केवल बच्चों से नहीं, माता-पिता से भी कराया जाना चाहिए। संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि मोबाइल का विकल्प दीजिए
बच्चे को केवल यह कहना कि मोबाइल मत देखो पर्याप्त नहीं है। उसके सामने विकल्प भी होना चाहिए।
खेल का मैदान हो।
कहानी की किताब हो।
संगीत हो।
चित्रकारी हो।
बागवानी हो।
साइकिल हो।
दोस्तों के साथ खेल हो।
सबसे महत्वपूर्ण—दादा-दादी और नाना-नानी के साथ संवाद हो।
बच्चे को यदि वास्तविक दुनिया में आनंद मिलेगा तो आभासी दुनिया पर उसकी निर्भरता स्वतः कम होगी बुजुर्गों के लिए उन्हें समय देना सबसे बड़ी दवा है।बुजुर्गों को सबसे अधिक आवश्यकता महँगी वस्तुओं की नहीं, अपनेपन की होती है।परिवार प्रतिदिन कुछ समय उनके साथ बैठे। उनसे उनके बचपन की बातें पूछे। उनके अनुभव सुने। पुरानी तस्वीरें देखें। उनके साथ टहलने जाएँ। उन्हें घर के छोटे-छोटे निर्णयों में शामिल करें।
उनसे पूछा जाए आप क्या सोचते हैं
यह छोटा-सा प्रश्न किसी बुजुर्ग को यह एहसास दिला सकता है कि वह अभी भी परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सामाजिक समर्थन, सामुदायिक गतिविधियों, समूहों, रचनात्मक गतिविधियों और स्वयंसेवी सहभागिता जैसे उपायों को महत्वपूर्ण मानता है ।घर में ‘नो-स्क्रीन टाइम’ होना चाहिए।प्रतिदिन कम-से-कम एक ऐसा समय होना चाहिए जब परिवार के सभी सदस्य मोबाइल और अन्य स्क्रीन से दूर रहें।उस समय परिवार बातचीत करे।।एक साथ भोजन कर,टहले,हँसे।पुरानी स्मृतियाँ साझा करे,बच्चे प्रश्न पूछें और बुजुर्ग उत्तर दें।यही संवाद परिवार को मानसिक स्वास्थ्य की पहली सुरक्षा देता है।सोशल मीडिया को वास्तविक जीवन का विकल्प न बनने दें।सोशल मीडिया मित्रता का विकल्प नहीं है। लाइक अपनापन नहीं है और हजारों ऑनलाइन संपर्क वास्तविक सामाजिक संबंधों की गारंटी नहीं देते। बच्चों और युवाओं को यह समझाना होगा कि आभासी दुनिया में दिखाई देने वाला जीवन अक्सर वास्तविक जीवन का पूरा चित्र नहीं होता। दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करना आत्मसम्मान और मानसिक शांति को प्रभावित कर सकता है।
नींद और शारीरिक गतिविधि को प्राथमिकता स्क्रीन के कारण देर रात तक जागना बच्चों और युवाओं में विशेष चिंता का विषय है। एप की सलाह में पर्याप्त नींद, दैनिक शारीरिक गतिविधि और सोने के समय उपकरणों से दूरी जैसे स्वस्थ व्यवहारों को प्राथमिकता दी गई है।इसलिए मोबाइल बंद करने का समय उतना ही महत्वपूर्ण है जितना मोबाइल चलाने का समय। मानसिक परेशानी को ‘जिद’ न समझें
यदि कोई बच्चा लगातार उदास रहता है, चिड़चिड़ा हो गया है, पढ़ाई में रुचि खो रहा है, नींद या भोजन में बड़ा बदलाव आया है, लोगों से कट रहा है अथवा इंटरनेट के बिना अत्यधिक बेचैनी महसूस करता है, तो उसे केवल मोबाइल का आदी कहकर डाँटना उचित नहीं।इसी प्रकार यदि कोई बुजुर्ग लगातार अकेलापन, निराशा, उदासी, भय या सामाजिक दूरी महसूस करता है तो उसे भी उम्र का असर कहकर टालना नहीं चाहिए।
ऐसी स्थिति में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
हमें तकनीक छोड़नी नहीं, तकनीक पर नियंत्रण पाना है।विश्व स्वास्थ्य संगठन की युवा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समीक्षा यह स्पष्ट करती है कि तकनीक और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध एकतरफा नहीं है। डिजिटल तकनीक शिक्षा, संपर्क और सहायता का माध्यम भी बन सकती है; लेकिन कमजोर परिस्थितियों में इसके नकारात्मक प्रभाव अधिक गंभीर हो सकते हैं।
अब सवाल इंटरनेट बनाम जीवन का नहीं है। प्रश्न है इंटरनेट जीवन को चला रहा है या जीवन इंटरनेट को चला रहा है?हमें बच्चों को मोबाइल से नहीं, मोबाइल की गुलामी से बचाना है। हमें बुजुर्गों को इंटरनेट से नहीं, अकेलेपन से बचाना है।घर में एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ बच्चा मोबाइल की स्क्रीन से अधिक माता-पिता की आँखों में खुशी खोजे और बुजुर्ग टीवी की आवाज से अधिक अपने बच्चों की आवाज सुनना पसंद करें।तकनीक हमारे जीवन की सहायक बने, हमारी संवेदना की प्रतिस्पर्धी नहीं।
बच्चे के हाथ में मोबाइल देने से पहले उसके हाथ में अपना हाथ रखिए। बुजुर्ग के हाथ में स्मार्टफोन देने से पहले उसके पास कुछ देर बैठिए। शायद मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में सबसे बड़ा समाधान किसी ऐप, किसी मशीन या किसी एल्गोरिद्म में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए निकाले गए समय में छिपा है।आज समाज को स्क्रीन टाइम के साथ-साथ फैमिली टाइम की भी आवश्यकता है। क्योंकि मनुष्य को केवल इंटरनेट से कनेक्शन नहीं चाहिए उसे मनुष्य से मनुष्य का संबंध चाहिए।





