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सच हार नही सकता

सम्पादकीय

साहित्य-जगत ने आज खो दिया जीवंत साहित्यिक चेतना

जनचेतना के प्रखर कवि थे बिहार राज्यगीत रचयिता कविवर सत्यनारायण

डॉ. ध्रुव कुमार

लेखक -पत्रकार

कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं होती। वह समय की धड़कन, समाज की बेचैनी और मनुष्य के भीतर बची हुई उम्मीद की आवाज भी होती है। कुछ कवि अपने समय को केवल देखते हैं, कुछ उसे शब्द देते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी कविता से समय की दिशा बदलने का प्रयास करते हैं। कविवर सत्यनारायण ऐसे ही कवि थे। वे सामाजिक सरोकार, जनचेतना और मानवीय मूल्यों के प्रखर कवि थे। बिहार के जनजीवन, उसकी मिट्टी, उसकी पीड़ा और उसके संघर्ष को उन्होंने अपनी रचनात्मक चेतना का हिस्सा बनाया।

1974 के जेपी आंदोलन में अपनी कविताओं से जनमानस को जागृत करने वाले और बिहार राज्यगीत ‘तूझको शत-शत बंधन बिहार’ के रचयिता कविवर सत्यनारायण आज तड़के चिरनिद्रा में चले गए। पटना के कदमकुआं स्थित बी.पी. सिन्हा पथ, डी-ब्लॉक स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से हिंदी और भोजपुरी साहित्य-जगत ने केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवंत साहित्यिक चेतना खो दी है, जो अपने समय से लगातार संवाद करती रही।

सत्यनारायण जी सामाजिक सरोकार के साथ-साथ जन-जागरण के कवि थे। उनकी कविता में जीवन की धूप-छांव, समाज की विडंबनाएं, लोकतांत्रिक आकांक्षाएं और मनुष्य के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है। 1974 का आंदोलन हो या वर्तमान समय की सामाजिक चुनौतियां-उन्होंने अपनी रचनाशीलता और सक्रियता से हमेशा नई पीढ़ी को सोचने, सवाल करने और अपने समय के प्रति सजग रहने की प्रेरणा दी।

मेरा यह सौभाग्य रहा कि जयप्रकाश आंदोलन की जीवंत स्मृतियां जिन लोगों से सुनने का अवसर मिला, उनमें कविवर सत्यनारायण जी प्रमुख थे। उनसे इस विषय पर बीसियों बार बातचीत हुई होगी-कभी औपचारिक, कभी अनौपचारिक। कभी दूरदर्शन के लिए साक्षात्कार के दौरान, कभी किसी समाचार-पत्र के लिए बातचीत करते हुए, तो कभी उनके आवास के ड्राइंग रूम में चाय की चुस्कियों के बीच। कई बार उनकी गली के नुक्कड़ की चाय की दुकान भी हमारी बातचीत का ठिकाना बनी। जेपी आंदोलन की चर्चा छिड़ते ही उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक उतर आती थी। आंखों में जैसे बीते दिनों की पूरी दुनिया एक साथ जीवित हो उठती। वे केवल आंदोलन की घटनाएं नहीं सुनाते थे, बल्कि उस दौर की बेचैनी, उम्मीद, संघर्ष और लोकतांत्रिक चेतना को अपनी स्मृतियों के माध्यम से फिर से सामने ला देते थे। उनकी आवाज में उस दौर की धड़कन सुनाई देती थी।

उनके लिए जेपी आंदोलन केवल इतिहास की एक घटना नहीं था, वह जनशक्ति और लोकतांत्रिक चेतना में उनके विश्वास का जीवंत अध्याय था।

कविवर सत्यनारायण मूलतः भोजपुर की धरती के सपूत थे। उनका जन्म 13 सितंबर 1935 को कौलोडिहरी गांव, अंचल सहर, तत्कालीन शाहाबाद और वर्तमान भोजपुर जिले में हुआ था। गांव में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे पटना आए और पटना कॉलेज में उनका नामांकन हुआ। यहीं उनकी साहित्यिक चेतना को विस्तार मिला।

कॉलेज जीवन में ही उन्हें काव्य-पाठ प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला। उन्होंने जयद्रथ वध की कुछ पंक्तियों का पाठ किया और पुरस्कृत हुए। उनके हिंदी शिक्षक डॉ. रामखेलावन पांडे थे, जिनका स्नेह और आशीर्वाद उन्हें लंबे समय तक मिलता रहा। कविता की दुनिया में तुकबंदी से लेकर गीत के व्याकरण तक की पहली गंभीर सीख उन्हें कवि रामगोपाल रूद्र से मिली। वे एक शिक्षक की तरह उनकी रचनाओं को स्नेहपूर्वक सुधारते, उनकी कमियों की ओर ध्यान दिलाते और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते। सत्यनारायण जी अक्सर इस ऋण को बड़ी आत्मीयता से याद करते थे।

यह वह दौर था जब देश स्वतंत्रता संघर्ष के निर्णायक चरण से गुजर रहा था। 1942 से 1946 के बीच का वह समय उनके किशोर और युवा मन पर गहरी छाप छोड़ रहा था। आजादी के तराने उनके होठों पर रहते थे और देश की मुक्ति की आकांक्षा उनकी संवेदना में धीरे-धीरे आकार ले रही थी।

बच्चन की कविता और स्मृति में दर्ज एक मुलाकात

कॉलेज के दिनों में उन्हें हरिवंश राय बच्चन को सुनने का अवसर मिला। बच्चन जी किसी अध्यापक से मिलने कॉलेज आए थे। छात्रों ने उनसे कविता सुनाने का आग्रह किया। कक्षा-कक्ष में ही उन्होंने अपने दो गीत सुनाए। युवा सत्यनारायण के मन पर उस काव्य-पाठ की अमिट छाप पड़ी।

वह केवल कविता सुनने का क्षण नहीं था, वह एक युवा कवि के भीतर कविता के प्रति गहरी आस्था के अंकुर फूटने का क्षण था। बच्चन की आवाज और उनके गीतों की अनुगूंज सत्यनारायण जी की स्मृतियों में जीवन भर बनी रही।

नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर

सत्यनारायण जी ने कविता, विशेषकर गीत और नवगीत को अपनी विशिष्ट रचनात्मक पहचान दी। उनकी रचनाओं में परंपरा और आधुनिकता का सहज संवाद दिखाई देता है। वे गीत को केवल भावुक अभिव्यक्ति मानने के पक्ष में नहीं थे। उनके लिए गीत अपने समय की जटिलताओं और सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने का समर्थ माध्यम था।

उनकी प्रमुख कृतियों में तुम ना नहीं कर सकते (कविता-संग्रह, 1983), टूटते जल बिंब (नवगीत-संग्रह, 1985), सभाध्यक्ष हंस रहा है (नवगीत/कविता-संग्रह, 2011), सुने प्रजाजन (गीत/नवगीत-संग्रह, 2011) तथा स्मृतियों में (साहित्यकारों के संस्मरण, 1987) उल्लेखनीय हैं।

उन्होंने धरती से जुड़कर जैसे कविता-संग्रह तथा नुक्कड़ कविता जैसी पत्रिका के संपादन से भी साहित्यिक सक्रियता को विस्तार दिया। उनकी रचनाएं नवगीत अर्द्धशती (संपादक : शंभूनाथ सिंह, 1986), धार पर हम (संपादक: वीरेंद्र आस्तिक, 1998), श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन (संपादक:  कन्हैयालाल नंदन, 2001) सहित देश के अनेक महत्वपूर्ण संकलनों में शामिल हुईं।

‘गीत’ और ‘कविता’ के बीच खड़ी की गई दीवार के विरुद्ध

एक बार बातचीत में नई कविता, अकविता, गीत और नवगीत पर विस्तार से चर्चा हुई। सत्यनारायण जी की अपनी स्पष्ट मान्यता थी कि साहित्य को खेमों और खांचों में बांटना उसकी रचनात्मक शक्ति को सीमित करता है।

वे बताते थे कि 1950 के दशक में नई कविता के कुछ प्रवक्ताओं ने गीत की अस्मिता पर सवाल उठाए तो गीत के कवियों ने भी नई कविता पर प्रहार किया। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बनी कि कविता लिखने वाले ‘कवि’ और गीत लिखने वाले ‘गीतकार’ कहे जाने लगे।

उनका सवाल बहुत सीधा था- क्या गीत और नवगीत कविता नहीं हैं?

वे कहते थे कि छंद और छंदमुक्तता का अंतर अपनी जगह है, लेकिन कविता की मूल संवेदना, उसके बिंब, प्रतीक और कथ्य को केवल विधागत सीमाओं में बांधकर नहीं देखा जा सकता। वे निराला से लेकर नरेंद्र शर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री और आरसी प्रसाद सिंह तक की परंपरा का उदाहरण देते थे।

उनकी एक बात मुझे विशेष रूप से याद आती है-

“रचना कथ्य के अनुरूप अपना शिल्प गढ़ती है, इसे समझना होगा।”

यह केवल एक साहित्यिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उनकी अपनी रचनात्मक दृष्टि का सार था। मानवीय मूल्यों का क्षरण उन्हें सबसे अधिक चिंतित करता था। उनकी चिंता का केंद्र साहित्य से कहीं बड़ा था- मनुष्य और उसके भीतर बची हुई मनुष्यता।

वे वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों के क्षरण को लेकर चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि जब समाज में सफलता ही अंतिम लक्ष्य बन जाए और उसके लिए शॉर्टकट को स्वीकार कर लिया जाए, तब साहित्य भी उससे अछूता नहीं रह सकता। वे साहित्य में श्रम, साधना, ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता को आवश्यक मानते थे।

उनकी बातचीत में अक्सर यह चिंता उभरती थी कि साहित्य केवल प्रसिद्धि अर्जित करने का माध्यम न बने, वह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाए। शायद यही कारण था कि उम्र के अंतिम पड़ाव तक उनकी रचनात्मक सक्रियता बनी रही।

हिंदी और भोजपुरी साहित्य की सात दशकों से अधिक लंबी यात्रा में सत्यनारायण जी ने अनेक महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए। उनके विशिष्ट साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार सरकार का विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान (1980), शाद अजीमाबादी सम्मान सहित अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया।

बिहार राज्यगीत ‘तूझको शत-शत बंधन बिहार’ के लिए उन्हें वर्ष 2012 में एक लाख रुपये की सम्मान राशि से पुरस्कृत किया गया। वे हिंदी प्रगति समिति के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत रहे। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन सहित अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़कर उन्होंने साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दिया।

उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी साहित्यिक बेचैनी कम नहीं हुई थी। हाल के महीनों तक वे रचनात्मक रूप से सक्रिय रहे। साहित्य उनके लिए पेशा नहीं, जीवन-पद्धति था, कविता उनके लिए अभिव्यक्ति मात्र नहीं, समाज से संवाद का माध्यम थी।

सत्यनारायण जी की कविता में बिहार की माटी की गंध थी। उसमें भोजपुर की लोक-संवेदना थी, गांव की स्मृतियां थीं, शहर की बेचैनियां थीं और बदलते समाज की चुनौतियों से मुठभेड़ थी। उन्होंने हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं के साहित्य को समृद्ध किया।

कविता की अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले सत्यनारायण जी की रचनाएं अपने समय का दस्तावेज भी हैं और अपने समय से संवाद भी। उन्होंने बिहार को हिंदी साहित्य के मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे केवल बिहार के कवि नहीं थे। हिंदी और भोजपुरी के ऐसे सर्वमान्य रचनाकार थे, जिनकी रचनात्मक उपस्थिति देश की सीमाओं से बाहर तक महसूस की गई।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी कविताएं, उनके विचार और उनकी स्मृतियां ही उनकी जीवित उपस्थिति हैं। उनके साथ बिताए वे क्षण, चाय की प्याली के साथ हुई वे लंबी बातचीतें और जेपी आंदोलन के उन दिनों को याद करते समय उनकी आंखों में उतर आने वाली वह चमक – अब स्मृति की अमूल्य धरोहर है।

कवि चला गया है, लेकिन उनकी कविता अभी बाकी है,

उनकी आवाज अभी बाकी है। और जब तक बिहार की धरती, उसकी भाषा और उसके जनजीवन में संवेदना की कोई धड़कन शेष है, कविवर सत्यनारायण की स्मृति भी जीवित रहेगी।

कविवर को शत-शत नमन।

 

 

 

 

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