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सम्पादकीय

ब्रिक्स सम्मेलन संघर्षों के बीच संवाद की डिप्लोमेसी

संजीव ठाकुर,

रायपुर छत्तीसगढ़

नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के 18वें सम्मेलन में भारत की कूटनीति की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने संघर्षों के बीच संवाद की संभावना को जीवित रखा। भारत ने ब्रिक्स को किसी देश के विरुद्ध मोर्चा बनाने के बजाय विकास, आर्थिक सहयोग, तकनीक, ऊर्जा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मंच बनाए रखने पर जोर दिया। भारत के लिए यह भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक ओर अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग करता है, दूसरी ओर रूस और चीन के साथ ब्रिक्स तथा अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं में संवाद बनाए रखता है। यह संतुलन भारतीय विदेश नीति की परिपक्वता को दर्शाता है।
ब्रिक्स का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि सदस्य देश आपसी व्यापार को अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में बढ़ाते हैं, सीमा-पार डिजिटल भुगतान प्रणालियों को जोड़ते हैं और वित्तीय सहयोग के नए रास्ते विकसित करते हैं, तो भविष्य में डॉलर पर कुछ क्षेत्रों की निर्भरता कम हो सकती है। लेकिन यहां भी अतिशयोक्ति से बचना चाहिए। निकट भविष्य में डॉलर को समाप्त कर देना या उसकी जगह किसी एक ब्रिक्स मुद्रा को स्थापित कर देना व्यावहारिक लक्ष्य नहीं है। ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्थाओं, वित्तीय नीतियों और राजनीतिक प्राथमिकताओं में बहुत अंतर है। इसलिए वास्तविक संभावना किसी एक नई वैश्विक मुद्रा से अधिक भुगतान प्रणालियों के विविधीकरण और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की है।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी ब्रिक्स का महत्व तेजी से बढ़ा है। रूस, सऊदी अरब, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की उपस्थिति ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न को संगठन के केंद्र में ला देती है। पश्चिम एशिया में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर तनाव का सीधा प्रभाव दुनिया की तेल कीमतों, महंगाई और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ता है। 2026 के सम्मेलन के समय भी पश्चिम एशिया का संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए गंभीर चिंता का विषय बना रहा।
तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की शक्ति का नया आधार बन सकती है। भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, चीन की विनिर्माण और तकनीकी क्षमता, रूस की वैज्ञानिक-तकनीकी विशेषज्ञता, खाड़ी देशों की पूंजी और ऊर्जा संसाधन तथा ब्राजील और अफ्रीकी देशों के विशाल बाजार मिलकर सहयोग का नया मॉडल बना सकते हैं। यदि ब्रिक्स अपने भीतर तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, हरित ऊर्जा और डिजिटल भुगतान में ठोस सहयोग विकसित करता है तो उसका प्रभाव केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में विश्व व्यवस्था जिस तेजी से बदल रही है, उसमें ब्रिक्स का विस्तार और उसकी बढ़ती भूमिका केवल एक आर्थिक संगठन के विस्तार की कहानी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन में हो रहे मौलिक परिवर्तन का संकेत भी है। भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने इस बदलती विश्व व्यवस्था को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। आज ब्रिक्स केवल ब्राजील, रूस, भारत और चीन से बना पुराना समूह नहीं रहा। इसमें दक्षिण अफ्रीका के बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे महत्वपूर्ण देश जुड़ चुके हैं। वर्तमान 11 सदस्यीय समूह विश्व की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है।
इसलिए यह स्वाभाविक है कि ब्रिक्स सम्मेलन को अब केवल विकासशील देशों की बैठक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके आर्थिक आकार, ऊर्जा संसाधनों, विशाल बाजार, युवा आबादी, प्राकृतिक संसाधनों और सामरिक स्थिति ने इसे वैश्विक राजनीति का एक प्रभावशाली मंच बना दिया है। विशेष रूप से भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों के साथ ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे ऊर्जा-संपन्न देशों की उपस्थिति ब्रिक्स को आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। जनवरी 2024 से हुए विस्तार और जनवरी 2025 में इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने के बाद संगठन की भौगोलिक और आर्थिक पहुंच कहीं अधिक व्यापक हो गई है।
ब्रिक्स की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनसंख्या और बाजार में निहित है। भारत और चीन अकेले ही विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले दो देश हैं। इनके साथ इंडोनेशिया, ब्राजील, रूस, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और अन्य सदस्य देशों को जोड़ दें तो विश्व की लगभग आधी मानव आबादी इस मंच से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाती है। यह संख्या केवल आंकड़ा नहीं है; यह उपभोक्ता बाजार, श्रमशक्ति, उत्पादन क्षमता, ऊर्जा मांग, तकनीकी विकास और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं का विशाल आधार है। यही कारण है कि ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में अधिक गंभीरता से देखा जा रहा है। भारत सरकार के अनुसार ब्रिक्स अब वैश्विक शासन व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हितों को समन्वित करने वाला महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
यहीं से पश्चिमी देशों की बेचैनी को समझने की आवश्यकता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा ब्रिक्स के कारण किसी तत्काल आर्थिक संकट में हैं, लेकिन यह जरूर है कि विश्व अर्थव्यवस्था और वैश्विक संस्थाओं पर लंबे समय से स्थापित पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने वाली एक वैकल्पिक सामूहिक शक्ति उभर रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, वैश्विक भुगतान प्रणाली, डॉलर की केंद्रीय भूमिका और पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग ब्रिक्स देशों के एजेंडे में लगातार प्रमुख होती जा रही है। 2026 के सम्मेलन से पहले ब्रिक्स के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, पारदर्शिता और जवाबदेही तथा सीमा-पार भुगतान प्रणालियों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
हालांकि ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी सैन्य गठबंधन समझना भी एक गंभीर भूल होगी। ब्रिक्स की वास्तविक चुनौती पश्चिम को युद्ध के मैदान में चुनौती देने की नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था को अधिक बहुध्रुवीय बनाने की है। भारत इस अंतर को सबसे स्पष्ट रूप से सामने रखता है। भारत के लिए ब्रिक्स का अर्थ अमेरिका या यूरोप से दूरी बनाना नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखते हुए रूस, चीन, पश्चिम एशिया, यूरोप और अमेरिका—सभी के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखना है। यही भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है।
2026 का सम्मेलन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि ब्रिक्स के भीतर ही अनेक प्रकार के मतभेद मौजूद हैं। भारत और चीन के बीच सीमा तथा व्यापार से जुड़े प्रश्न हैं। ईरान और खाड़ी के कुछ देशों के बीच गंभीर क्षेत्रीय तनाव रहे हैं। रूस और पश्चिम के बीच यूक्रेन युद्ध के कारण गहरा राजनीतिक टकराव है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष ने पश्चिम एशिया को अस्थिर बनाया है। ऐसे समय में इतने विविध राजनीतिक हितों वाले देशों को एक साझा मंच पर लाना अपने आप में एक कूटनीतिक परीक्षा है। सम्मेलन के दौरान भारत की भूमिका इसी कारण विशेष महत्व रखती है। ईरान का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ईरान 2024 से ब्रिक्स का सदस्य है और पश्चिम एशिया में उसकी सामरिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देश भी ब्रिक्स में हैं, जिनके अमेरिका के साथ पुराने और महत्वपूर्ण सुरक्षा संबंध हैं। इस प्रकार ब्रिक्स के भीतर ही पूर्व और पश्चिम के बीच संबंधों की जटिलता दिखाई देती है। यह संगठन किसी एक शक्ति की कठपुतली नहीं बन सकता, क्योंकि उसके सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित एक-दूसरे से कई बार अलग हैं। यही उसकी कमजोरी भी है और उसकी लोकतांत्रिक प्रकृति का प्रमाण भी है।फिर भी ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक एकता है। इतने विविध देशों के बीच साझा घोषणापत्र तैयार करना आसान नहीं है। 2026 के सम्मेलन में भी सदस्य देशों ने कई मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील विषयों पर सभी देशों के हित समान नहीं हैं। यही कारण है कि ब्रिक्स की शक्ति का वास्तविक परीक्षण उसके घोषणापत्र में नहीं, बल्कि उन घोषणाओं को आर्थिक और संस्थागत उपलब्धियों में बदलने की क्षमता में होगा।
इस पूरी परिस्थिति में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि ब्रिक्स कल ही पश्चिमी व्यवस्था को समाप्त कर देगा। वास्तविक चुनौती यह है कि दुनिया अब एकध्रुवीय व्यवस्था को स्थायी मानकर चलने के लिए तैयार नहीं है। वैश्विक दक्षिण अपनी आर्थिक क्षमता के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति चाहता है। यही मांग ब्रिक्स के विस्तार के पीछे सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक तत्वों में से एक है।
यहां पाकिस्तान का उल्लेख भी आवश्यक है। पाकिस्तान ने ब्रिक्स की सदस्यता में रुचि दिखाई है, लेकिन वह वर्तमान में ब्रिक्स का सदस्य नहीं है। 2026 के 18वें शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान सदस्य देश के रूप में शामिल नहीं था। इसलिए उसे ब्रिक्स के मौजूदा आर्थिक-सामरिक समूह का हिस्सा बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
अंततः ब्रिक्स सम्मेलन को पूर्व बनाम पश्चिम की लड़ाई के रूप में देखना भी सीमित दृष्टिकोण होगा। इसकी असली कहानी विश्व व्यवस्था के पुनर्संतुलन की है। पश्चिम के पास आज भी अत्यंत शक्तिशाली वित्तीय संस्थाएं, उन्नत तकनीक, सैन्य क्षमता और वैश्विक कंपनियां हैं। दूसरी ओर ब्रिक्स के पास विशाल जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा, उत्पादन क्षमता, तेजी से बढ़ते बाजार और ग्लोबल साउथ की व्यापक आकांक्षाएं हैं। आने वाले वर्षों में सफलता उसी पक्ष की होगी जो टकराव के बजाय सहयोग, प्रतिबंधों के बजाय संवाद और प्रभुत्व के बजाय साझेदारी को प्राथमिकता देगा।
भारत के लिए यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत यदि ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से बचाते हुए ग्लोबल साउथ की वास्तविक आवाज, आर्थिक सहयोग का प्रभावी मंच और वैश्विक संस्थाओं के लोकतांत्रिक सुधार का माध्यम बना सके तो यह उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक होगी। ब्रिक्स की अग्निपरीक्षा केवल यह नहीं है कि वह पश्चिम को कितना चुनौती देता है; उसकी असली अग्निपरीक्षा यह है कि वह बदलती दुनिया को कितना अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित, शांतिपूर्ण और आर्थिक रूप से समावेशी बना पाता है। यही 21वीं सदी की नई विश्व व्यवस्था की दिशा भी तय करेगा।

 

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