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सम्पादकीय

विश्वकर्मा पूजन : शिल्प से विज्ञान तक भारतीय ज्ञान परम्परा का अद्भुत संगम

ज्योतिषाचार्य अरुण कुमारमिश्र

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक उत्सव केवल सामाजिक अथवा धार्मिक आयोजन नहीं होता, अपितु उसके भीतर गहन वैज्ञानिकता, शास्त्रीय चिंतन और मानव मनोविज्ञान की सूक्ष्म समझ निहित रहती है। विश्वकर्मा पूजन भी ऐसा ही पर्व है, जिसमें सृष्टि, शिल्प, वास्तु, तकनीक, श्रम और सृजन की भारतीय अवधारणा एक साथ दिखाई देती है।

विश्वकर्मा देव को भारतीय परम्परा में दिव्य शिल्पी, वास्तुविद् और सृजन के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किया जाता है। वैदिक साहित्य में विश्वकर्मा शब्द का प्रयोग अत्यन्त व्यापक अर्थ में हुआ है। ऋग्वेद के विश्वकर्मा सूक्त में विश्वकर्मा को विश्व की रचना और व्यवस्था से सम्बद्ध परम सृजनशक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

ऋग्वेद 10.82.1 में कहा गया है
विश्वकर्मा विमना आदधाय
धाता विधाता परमोत संदृक्।
ऋग्वेद 10.82 सूक्त के मंत्रों में विश्वकर्मा को ऐसी दिव्य सत्ता के रूप में चित्रित किया गया है जो समस्त विश्व की रचना, धारण और व्यवस्था के रहस्य को जानती है। ऋग्वेद 10.82.5 में भी विश्वकर्मा के व्यापक सृजनात्मक स्वरूप का वर्णन मिलता है।

अर्थात् वैदिक दृष्टि में विश्वकर्मा की अवधारणा केवल किसी एक व्यवसाय या शिल्प तक सीमित नहीं है, बल्कि सृजन, निर्माण और विश्व-व्यवस्था की मूल चेतना से जुड़ी हुई है।

यजुर्वेदीय परम्परा में भी विश्वकर्मा को नमन करते हुये उनके विश्वव्यापी सृजनात्मक स्वरूप का स्मरण किया जाता है। इस प्रकार वैदिक प्रमाण यह स्थापित करते हैं कि निर्माण-कौशल और सृजन को भारतीय चिंतन ने अत्यन्त उच्च आध्यात्मिक स्थान प्रदान किया।
पुराणीय परम्परा में यही विश्वकर्मा देवशिल्पी के रूप में अधिक स्पष्ट होकर सामने आते हैं। देवताओं के भवन, दिव्य सभायें, नगर, रथ, आयुध और विविध वास्तु-रचनायें उनके शिल्प-कौशल से सम्बद्ध मानी गई हैं। महाभारत के सभापर्व में मयसभा का वर्णन मिलता है और भारतीय पुराण तथा आख्यान-परम्परा में विश्वकर्मा देवताओं के दिव्य निर्माणों के प्रधान शिल्पी माने जाते हैं।

इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजन केवल किसी मशीन की पूजा नहीं है। इसके पीछे मूल भावना है उस बुद्धि, कौशल, श्रम और सृजनशीलता के प्रति सम्मान, जिसके द्वारा मनुष्य प्रकृति से प्राप्त पदार्थों को उपयोगी रूप प्रदान करता है।

श्रम ही सृजन का आधार

भारतीय दर्शन में कर्म को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।

अर्थात् मनुष्य अपने कर्म के द्वारा परम सत्ता की आराधना करते हुए सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
यही भाव विश्वकर्मा पूजन के मूल में दिखाई देता है। कारीगर का औजार, किसान का कृषि उपकरण, अभियंता की मशीन, वास्तुविद् की रचना, तकनीकी विशेषज्ञ का कंप्यूटर और उद्योग में प्रयुक्त यंत्र — ये सभी मनुष्य के कर्म के साधन हैं। इसलिये इनके प्रति सम्मान वास्तव में श्रम और कर्म के प्रति सम्मान है।

आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्वकर्मा पूजन की परम्परा को उपकरणों के संरक्षण, स्वच्छता, निरीक्षण और सुरक्षित उपयोग की संस्कृति से जोड़ा जा सकता है। किसी भी मशीन की कार्यक्षमता केवल उसके निर्माण पर निर्भर नहीं करती। नियमित सफाई, निरीक्षण, रखरखाव, समय पर मरम्मत और सुरक्षित संचालन उसकी उपयोगिता तथा आयु को प्रभावित करते हैं। विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कार्यशालाओं और तकनीकी संस्थानों में मशीनों तथा उपकरणों की सफाई और देखभाल की परम्परा इस दृष्टि से अत्यन्त सार्थक दिखाई देती है।
अर्थात् पूजा का बाहरी कर्म हमें एक आंतरिक वैज्ञानिक अनुशासन की ओर प्रेरित करता है — साधन का सम्मान करो, उसकी देखभाल करो और उसका उपयोग उत्तरदायित्व के साथ करो।
मनुष्य जिस वस्तु को सम्मान देता है, उसके प्रति उसका व्यवहार भी अधिक उत्तरदायी हो जाता है। यही मनोवैज्ञानिक सिद्धांत विश्वकर्मा पूजन के व्यवहारिक पक्ष को समझने में सहायता करता है।

जब कोई शिल्पी अपने औजार को केवल निर्जीव वस्तु न मानकर अपने कर्म का पवित्र साधन मानता है, तो उसके भीतर कार्य के प्रति आत्मीयता उत्पन्न होती है। इससे कार्य के प्रति गंभीरता, अनुशासन और आत्मगौरव विकसित हो सकता है।
इस प्रकार विश्वकर्मा पूजन कर्मशील व्यक्ति को यह संदेश देता है कि श्रम छोटा या बड़ा नहीं होता। किसी भी साधन का मूल्य उसके आकार में नहीं, बल्कि उससे होने वाले सृजन में है।
आधुनिक औद्योगिक और

तकनीकी युग में प्रासंगिकता

आज विश्वकर्मा पूजन का क्षेत्र केवल पारम्परिक कारीगरों तक सीमित नहीं रहा। कारखानों, निर्माण संस्थानों, वाहन-गृहों, इंजीनियरिंग प्रतिष्ठानों, तकनीकी शिक्षण संस्थानों तथा सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े क्षेत्रों में भी इस पर्व की भावना दिखाई देती है।
आधुनिक युग में मशीनें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल हो गई हैं। रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कंप्यूटर, स्वचालित उत्पादन प्रणाली और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग उपकरण मानव जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ऐसे समय में विश्वकर्मा पूजन का मूल संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि तकनीक शक्ति है, परन्तु शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी आवश्यक है।

तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुगम बनाना है, न कि मानव मूल्यों को समाप्त करना। इसलिये विश्वकर्मा पूजन विज्ञान और नैतिकता के बीच संतुलन का सांस्कृतिक संदेश भी देता है।

17 सितम्बर और भारतीय कालगणना का प्रश्न
यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है। 17 सितम्बर भारतीय शास्त्रीय पंचांग की तिथि नहीं, बल्कि ग्रेगोरियन अर्थात् अंग्रेजी कैलेंडर की तिथि है। भारतीय धर्मशास्त्रीय कालगणना में किसी पर्व का निर्धारण सामान्यतः तिथि, नक्षत्र, मास, पक्ष और सूर्य की संक्रांति आदि के आधार पर किया जाता है।

इसलिये 17 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजन के रूप में प्रचलित करना आधुनिक सामाजिक और औद्योगिक परम्परा का विषय है। इसे सीधे किसी वैदिक मंत्र या शास्त्रीय तिथि के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

भारतीय ज्योतिषीय परम्परा में सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश का विशेष महत्त्व है। आधुनिक काल में सूर्य के इस संक्रमण को ग्रेगोरियन कैलेंडर की लगभग 17 सितम्बर वाली तिथि से जोड़कर विश्वकर्मा पूजा की स्थिर तिथि के रूप में व्यापक लोकप्रचलन मिला। किंतु दोनों को एक ही कालगणना-पद्धति मान लेना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है।

अतः 17 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजन की प्रचलित सामाजिक तिथि कहना और भारतीय पंचांग में उसकी वास्तविक तिथि का निर्धारण करना — इन दोनों बातों में स्पष्ट अंतर रखना आवश्यक है।

शास्त्र और आधुनिकता का संतुलन

विश्वकर्मा पूजन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें प्राचीन भारतीय चिंतन और आधुनिक तकनीकी सभ्यता के बीच एक अद्भुत सेतु दिखाई देता है।
वेद हमें विश्वकर्मा की सृजनशक्ति का बोध कराते हैं।
पुराण और महाकाव्य उन्हें देवशिल्पी के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता  कर्म को आराधना का स्वरूप प्रदान करती है।

विज्ञान हमें साधनों के उचित रखरखाव और सुरक्षित उपयोग की शिक्षा देता है।
मनोविज्ञान हमें बताता है कि सम्मान और आत्मीयता कार्य के प्रति उत्तरदायित्व को सुदृढ़ कर सकते हैं।

और आधुनिक उद्योग हमें दिखाता है कि मानव की सृजनशील बुद्धि किस प्रकार मशीनों और तकनीक के माध्यम से संसार को निरन्तर बदल रही है।
विश्वकर्मा पूजन केवल औजारों, मशीनों अथवा कारखानों की पूजा का पर्व नहीं है। यह मानव की सृजनशील चेतना, श्रम, कौशल, तकनीकी बुद्धि और कर्मनिष्ठा का सम्मान है।
इस पर्व का वास्तविक संदेश यह है कि जिस साधन से हम संसार का निर्माण करते हैं, उसका सम्मान भी करें और उसके उपयोग की मर्यादा भी समझें। तकनीक हमारे हाथ में शक्ति है, लेकिन उस शक्ति को दिशा देने वाली चेतना मनुष्य के भीतर होनी चाहिये।

इसीलिये विश्वकर्मा पूजन भारतीय संस्कृति की उस विराट दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें शिल्प और साधना, विज्ञान और अध्यात्म, श्रम और सम्मान तथा तकनीक और नैतिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

विश्वकर्मा पूजन हमें यही स्मरण कराता है कि सच्चा निर्माण केवल ईंट, पत्थर, धातु और मशीन से नहीं होता। सच्चा निर्माण तब होता है, जब मनुष्य अपने कौशल को सद्बुद्धि, परिश्रम को निष्ठा और तकनीक को मानवकल्याण से जोड़ देता है।

 

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