मालंच नई सुबह

सच हार नही सकता

other सम्पादकीय

क्या बिहार में कांग्रेस कभी स्वयं उभरेगी?

संजीव कुमार

पटना

कांग्रेस का सूरज कभी अस्त नहीं होता था। बिहार में एक कहावत थी कि राज करना कांग्रेस जानती है। लेकिन गत 35 वर्षों से कांग्रेस का बिहार में सिराजा बिखर गया है। महागठबंधन में कांग्रेस एक- एक सीट  के लिए मोहताज हो गई है। हर कदम पर समझौता करना अब कांग्रेस की नियति बन गई है। पुराने कांग्रेसी भी यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कांग्रेस कभी अपने पैरों पर खड़ी हो पाएगी?

महागठबंधन के घटक दलों के बीच लंबे विवाद के बाद समझौता हुआ। गुरुवार को पटना के होटल मौर्या में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें महागठबंधन की ओर से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया गया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में महागठबंधन की दरार साफ दिख रही थी। प्रेस कांफ्रेंस के बैक ड्रॉप से राहुल गांधी की तस्वीर गायब थी। वहां सिर्फ तेजस्वी यादव की तस्वीर लगी हुई थी।

इस चुनाव में कांग्रेस की सबसे अधिक बेइज्जती हो रही है। महागठबंधन के नाम पर कांग्रेस को बार-बार समझौता करना पड़ रहा है। उसकी लड़नेवाली सीटें कम कर दी गई। गत चुनाव में 70 सीटों पर लड़नेवाली कांग्रेस को इस बार सिर्फ 61 सीटों पर संतोष करना पड़ा। कहने को भले 61 सीटें हैं लेकिन इसमें 10 सीटों पर उसे महागठबंधन के प्रत्याशियों से भी जूझना है। पहले तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम की सीट पर भी राजद ने अपना प्रत्याशी उतार दिया था लेकिन गुरुवार को यह मामला सलट गया।
महागठबंधन के घटक दलों विशेषकर कांग्रेस के साथ सीटों का विवाद अभी तक नहीं सुलझ सका है। घटक दल अभी 11 सीटों पर चुनावी मैदान में आमने-सामने हैं। कांग्रेस राजद के साथ 5 सीटों पर भिड़ रही है। वहीं कांग्रेस को भाकपा (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) से चार सीटों पर और गठबंधन में शामिल नया दल आईआईपी से एक सीट पर मुकाबला करना पड़ रहा है। कांग्रेस को कहलगांव, वैशाली, नरकटियागंज, सिकंदरा और सुल्तानगंज में राजद प्रत्याशियों से भी लड़ना है। वहीं कांग्रेस का मुकाबला भाकपा से बछवारा, राजापाकर(सु), बिहारशरीफ और करगहर में हो रहा है। बेलदौर से कांग्रेस के प्रत्याशी मिथिलेश निषाद को गठबंधन में शामिल नए दल आईआईपी के प्रत्याशी तनीषा चौहान से जूझना पड़ रहा है।

एक प्रकार से कांग्रेस गठबंधन में अलग-थलग पड़ गई है। लालू यादव ने समन्वय के नाम पर अपनी सारी बातें मनवा ली। कांग्रेस ने नवादा के वारसलीगंज और वैशाली के लालगंज सीट से अपने उम्मीदवार का नामांकन वापस करा दिया। जबकि राजद ने ऐसी किसी भी सीट पर अपने उम्मीदवार का नाम वापस नहीं कराया, जहां दोनों पार्टियां आपस में भिड़ रही हो। एक प्रकार से राजद ने कांग्रेस से अपनी सारी बातें मनवा ली। सीट की संख्या कम करा दी, तेजस्वी यादव को गठबंधन की ओर से भावी मुख्यमंत्री घोषित करवा दिया और तो और दोस्ताना संघर्षवाली दो सीटों पर उम्मीदवार भी वापस करा दिया। एक प्रकार से कांग्रेस जिस गोद से निकलना चाह रही थी, अंततः वहीं पहुंच गई।

बिहार कांग्रेस के तमाम नेताओं की जमात में अल्लावरू अकेले ऐसे नेता थे, जो कांग्रेस के लिए लड़ रहे थे। उन्होंने काफी हद तक कांग्रेस को लालू यादव और राजद की पिछलग्गू वाली छवि से बाहर निकाला था। अन्य कांग्रेस प्रभारियों की तरह उन्होंने कभी लालू यादव के दरबार में हाज़िरी नहीं लगाई। वे कांग्रेस के हितों के लिए लगातार लड़ते और अड़ते रहे। लंबे समय से लंबित कई कमेटियों का गठन किया। संगठन में जान फूंकने की कोशिश की। राहुल गांधी को बिहार में एक्टिव किया। दलालों से मुक्त करा के पार्टी को कार्यकर्ताओं से जोड़ने की कोशिश की। राजद की मर्जी के बिना कांग्रेस संगठन में बदलाव किया। राजेश राम को अध्यक्ष बनाया। कन्हैया को भी आगे किया। कुल मिला कर उन्होंने कम समय को कांग्रेस को मजबूत करने के लिए भरसक प्रयास किए।

लेकिन पिछले एक महीने में स्थिति उनके हाथ से निकलती नजर आई। ऐसा लग रहा था कि टिकट बंटवारे को लेकर वे राजद और गठबंधन के दूसरे दलों से उचित समन्वय नहीं बिठा पा रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी उनकी मदद के लिए किसी अनुभवी नेता को आगे नहीं किया। उनके सहयोगी प्रभारी क्या कर रहे थे, ये किसी को भी पता नहीं चला। हालात इस कदर बिगड़ा कि पत्रकार कयास लगाने लगे कि क्या गठबंधन टूट के कगार पर पहुंच गया है?

राजनीति की जमीन कठोर होती है। यहां कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। दूसरों को घुटने टेकने पर मजबूर किया जाता है। अल्लावरू शायद यही कर रहे थे। कांग्रेस को जितनी जरूरत राजद की है, उससे कहीं अधिक कांग्रेस की आवश्यकता राजद को है। लालू प्रसाद हर हाल में तेजस्वी को मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाह रहे हैं। लालू प्रसाद के परिवार में महाभारत मचा हुआ है। तेज प्रताप परिवार से अलग हो गए हैं। रोहिणी आचार्य ने स्वयं को समेट लिया है। राजद के जनाधार में भी क्षरण हो रहा है। राहुल की लगातार यात्राओं ने पार्टी संगठन में जान फूंक दी थी। इस बार के चुनाव में कांग्रेस का अपर हैंड था। इसके लिए अल्लावरू जैसे नेताओं की अथक परिश्रम और दूरदृष्टि थी। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने कृष्णा अल्लावरू को ही उनको मौन कर दिया गया। यूथ कांग्रेस प्रभारी के पद से भी उनकी छुट्टी कर दी गई।

बिहार में महागठबंधन पर कटाक्ष करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और पाटलिपुत्र के सांसद रवि शंकर प्रसाद ने पूछ कि ये कैसा लचर गठबंधन है कि एक ओर तो राहुल गांधी की तस्वीर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं थी और दूसरी ओर बिहार में सीटें तो 243 हैं जबकि महागठबंधन 255 पर चुनाव लड़ रहा है।

 

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *