मालंच नई सुबह

सच हार नही सकता

साहित्य

हिन्दी, हिन्दू एवं राष्ट्रीय चेतना

रवीन्द्र कुमाररतन     

हाजीपुर बैशाली

भारतीय अस्मिता के तीनआयाम हिन्दी केवल संवाद कीभाषा नहीं, वह भारत की विविध आत्माओं को जोड़ने वाली संवेदना की भाषा है।

इसके शब्दों में लोक की मिट्टी है, संतों की वाणी है और स्वतंत्रता-संग्राम की हुंकार है।

हिन्दू केवल एक धार्मिक पहचान भर नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन जीवन-दृष्टि, संस्कृति और उदार परंपरा का व्यापक बोध भी है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसी अवधारणाएँ इसी जीवन-दृष्टि की उदात्त अभिव्यक्तियाँ हैं।
राष्ट्रीय चेतना उस भावना का नाम है,जिसमें व्यक्ति अपने निजी हित  से ऊपर उठकर राष्ट्र के हित को प्राथमिकता देता है।
हिन्दी ने इस राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त और प्रेमचंद तक साहित्यकारों ने जनमानस को जागृत किया।
कविता ने सोए हुए स्वाभिमान को जगाया और साहित्य ने स्वतंत्रता की आकांक्षा को जन-जन तक पहुँचाया।

‘भारत-भारती’ जैसी कृतियों ने राष्ट्र को केवल भूगोल नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में देखा।
हिन्दी की शक्ति उसकी व्यापकता में है; वह अनेक बोलियों और लोकभाषाओं को साथ लेकर चलती है।
अवधी, ब्रज, मैथिली, बज्जिका, भोजपुरी, मगही और अन्य लोकभाषाएँ हिन्दी की सांस्कृतिक समृद्धि को विस्तार देती हैं।
इसलिए हिन्दी का विकास किसी भाषा का वर्चस्व नहीं, बल्कि भारतीय भाषायी परिवार के परस्पर सम्मान का विषय होना चाहिए।
हिन्दू संस्कृति की मूल चेतना भी विविधता में एकता और सह-अस्तित्व का संदेश देती है।
राष्ट्रीय चेतना तब सार्थक होती है, जब उसमें देश के प्रत्येक नागरिक के प्रति सम्मान और समान अपनत्व हो।
राष्ट्रप्रेम किसी के प्रति घृणा नहीं सिखाता; वह अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य, समर्पण और गौरव का भाव जगाता है।

आज वैश्वीकरण के दौर में अपनी भाषा, संस्कृति और मूल्यों से जुड़ना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।
नई पीढ़ी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को अपनाए, पर अपनी जड़ों से उसका संबंध भी बना रहे।

हिन्दी हमारी अभिव्यक्ति को शक्ति दे, हिन्दू जीवन-दृष्टि हमारे संस्कारों को दिशा दे और राष्ट्रीय चेतना हमारे कर्म को उद्देश्य दे।

इन तीनों का समन्वय भारत को केवल समृद्ध नहीं, बल्कि संवेदनशील और सशक्त बनाएगा।

अंततः हमारी पहचान अनेकताओं में निहित उस विराट भारतीयता में है, जो सबको साथ लेकर चलना जानती है।

जहाँ भाषा में

आत्मीयता,संस्कृति में उदारता राष्ट्रीय चेतना का संवाहक है।

 

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