संजीव ठाकुर
रायपुर (छत्तीसगढ़)
रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल दो देशों का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व के लिए संभावित विनाश का संकेत बन चुका है। यह युद्ध आधुनिक सभ्यता के सामने एक ऐसी चुनौती प्रस्तुत कर रहा है जिसमें मानवीय संवेदनाएँ, वैश्विक शांति और राजनीतिक संतुलन सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। रूस की बौखलाहट, अमेरिका और नाटो देशों के हस्तक्षेप के साथ मिलकर इस युद्ध को तीसरे विश्वयुद्ध की दहलीज़ पर ला खड़ा कर चुकी है। रूस ने अमेरिका को खुले शब्दों में चेताया है कि यदि पश्चिमी देश इसी तरह यूक्रेन की आर्थिक और सामरिक मदद करते रहे तो उसे परमाणु या जैविक हथियारों के प्रयोग पर विवश होना पड़ सकता है। यह चेतावनी केवल शब्दों का खेल नहीं बल्कि आने वाले संकट का संकेत है, क्योंकि कीव पर हाल में किए गए रूस के बमवर्षक हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुतिन अब अपनी हार छिपाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। अमेरिकी अरबपति निवेशक जॉर्ज सोरस ने दावोस में अपने वार्षिक संबोधन में कहा था कि रूस और चीन का सीमा-विहीन गठबंधन वैश्विक शांति के लिए अत्यंत खतरनाक है। यदि पुतिन, शी जिनपिंग और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बीच यह रणनीतिक गठबंधन गहराता गया तो विश्वयुद्ध की संभावना को टाला नहीं जा सकेगा। सोरस के अनुसार यह संघर्ष अगर अनियंत्रित हुआ तो हमारी सभ्यता इसे झेल नहीं पाएगी और यह युद्ध समस्त मानवीय मूल्यों को मलबे में बदल देगा। पुतिन और शी जिनपिंग ने अपने हालिया संयुक्त बयान में स्पष्ट कर दिया था कि उनके संबंधों और सहयोग की कोई सीमा नहीं है। यह बयान एक नई ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का संकेत है जिसमें चीन और रूस एक साथ पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की तैयारी में हैं। पुतिन ने शी जिनपिंग को यूक्रेन पर विशेष सैन्य अभियान की जानकारी भी पहले ही दे दी थी, जिससे स्पष्ट है कि यह सब एक सुनियोजित रणनीति के अंतर्गत हुआ था। इसी बीच रूस के एक राजदूत ने इस्तीफा देकर पुतिन की कार्रवाई का विरोध किया, वहीं युद्ध में मारे गए सैनिकों के परिवारों ने भी देश के भीतर असंतोष प्रकट किया है। यूक्रेन पर आक्रमण के समय पुतिन को यह भ्रम था कि यूक्रेन में रहने वाले रूसी भाषा-भाषी नागरिक उनका समर्थन करेंगे, परंतु हुआ इसके ठीक विपरीत—उन्होंने यूक्रेन पर हमले की निंदा करते हुए रूस से नाता तोड़ लिया। यह पुतिन के लिए सबसे बड़ा झटका था जिसने उनके आत्मविश्वास को हिला दिया। अब उन्हें यह एहसास होने लगा है कि उन्होंने एक ऐतिहासिक भूल की है और इसी कारण वे संघर्ष-विराम की संभावनाएं तलाशने में जुटे हैं, किंतु वर्तमान परिदृश्य में विश्व समुदाय का विश्वास रूस से उठ चुका है। अब स्थिति यह बनती जा रही है कि या तो पुतिन अपनी राजनीतिक विफलता स्वीकार कर पद छोड़ दें या फिर चीन के सहयोग से इस संघर्ष को और गहराकर विश्व युद्ध की दिशा में ले जाएँ। रूस-यूक्रेन युद्ध अब तक लगभग तीस लाख करोड़ रुपए निगल चुका है और इसका अंत अभी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। अमेरिका और नाटो देशों ने यूक्रेन को लगातार हथियार, आर्थिक सहायता और युद्धक रणनीतियाँ मुहैया कराकर उसे एक
मज़बूत प्रतिरोधक शक्ति में बदल दिया है। इस सहायता से यूक्रेन न केवल टिके रहने में सफल रहा है बल्कि उसने रूस के कई मोर्चों पर पलटवार भी किया है। दूसरी ओर, रूस के सैनिकों और कमांडरों का मनोबल टूटने लगा है, जबकि रूसी नागरिकों में युद्ध के खिलाफ असंतोष बढ़ता जा रहा है। अब यूक्रेन के पास न धन की कमी है, न हथियारों की। उसके नागरिक अपने राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ पूरी निष्ठा और उत्साह से खड़े हैं। हालांकि युद्ध की विभीषिका भयंकर है — मारियोपोल जैसे शहरों में इमारतों के मलबे के नीचे से सैकड़ों शव निकाले जा रहे हैं, जिससे वहां मानवता कराह रही है। लगभग एक करोड़ यूक्रेनी नागरिक पोलैंड और अन्य यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की तरह जीवन बिता रहे हैं। यूरोपीय देश उन्हें हर संभव सहायता दे रहे हैं और यह संघर्ष अब केवल युद्ध का नहीं बल्कि मानवीय अस्तित्व का भी बन चुका है। इस युद्ध की आंच अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र तक फैलने लगी है। चीन और रूस के गठबंधन के खतरे को देखते हुए अमेरिका ने जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ टोक्यो सम्मेलन में सैन्य-रणनीतिक गठबंधन मजबूत करने का निर्णय लिया है। क्वाड जैसे संगठन चीन की विस्तारवादी नीतियों का प्रतिरोध कर रहे हैं। अमेरिका ने 13 देशों का एक आर्थिक समुदाय गठित कर चीन को वैश्विक व्यापारिक योजनाओं से अलग करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। चीन अब लद्दाख सीमा पर अपनी सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाकर भारत को दबाव में लाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन भारत सहित प्रशांत क्षेत्र के देश सतर्क हैं और संयुक्त रूप से इस नए भू-राजनीतिक खतरे का सामना करने के लिए तैयार हैं। अमेरिका और पश्चिमी देश अब चीन-रूस गठबंधन को वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं और विश्व को इनके विरुद्ध एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध अब एक ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें आधुनिक विश्व की नैतिकता, शक्ति और सभ्यता का चेहरा दिखाई दे रहा है। यदि यह युद्ध अनियंत्रित हुआ तो न केवल यूरोप बल्कि एशिया और अमेरिका तक इसके परिणाम पहुँचेंगे। इसलिए अब केवल एक ही विकल्प शेष है — इस युद्ध को शीघ्र समाप्त करने का सामूहिक प्रयास। जॉर्ज सोरस का कथन बिल्कुल सार्थक प्रतीत होता है कि “मानव सभ्यता को बचाने का सर्वोत्तम और एकमात्र तरीका है पुतिन को हराना और युद्ध को समाप्त करना।” आज विश्व राजनीति का हर मोर्चा, हर राष्ट्र, हर कूटनीति इस निर्णय के सामने खड़ा है कि क्या हम शांति को बचाने के लिए एकजुट होंगे या अहंकार, शक्ति और स्वार्थ के कारण अपनी ही सभ्यता को मिटा देंगे। समय साक्षी है कि परमाणु और जैविक हथियारों की धमकी के साये में मानवता बहुत देर तक नहीं टिक सकती। यदि यह युद्ध अब भी नहीं थमा, तो अगली सुबह शायद इतिहास नहीं लिखी जाएगी। यही समय है जब विश्व को अपनी सामूहिक बुद्धि, विवेक और करुणा से निर्णय लेना होगा, वरना यह युद्ध सभ्यता की अंतिम कहानी बन जाएगा।





