——-नीरव समदर्शी
बिहार की राजनीति इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ हर चाल सिर्फ पटना ही नहीं, दिल्ली की सत्ता–गणित को भी हिला सकती है। ध्यान देने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि जदयू को छोड़कर बीजेपी अपने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर सिर्फ पाँच–छह सीटों से ही मैजिक फिगर से दूर है। यह संख्या अमित शाह की चाणक्यनीति के लिए कोई कठिन बाधा नहीं मानी जाती। इसी कारण शपथ से पहले यह चर्चाएँ तेज थीं कि शाह “दबाव” बनाकर नीतीश कुमार को सम्मानजनक सेफ–रिटायरमेंट के लिए मनाना चाह रहे थे।
स्थिति साफ है: अगर बीजेपी प्रधानमंत्री के हालिया संकेतों के अनुसार कांग्रेस में तोड़फोड़ कर दे, या किसी छोटे दल को फोड़कर केंद्र में अपनी संख्या पूरी कर ले, तब न केवल समीकरण बदल जाएगा, बल्कि नीतीश न केवल पद से हाथ धो बैठेंगे, बल्कि उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। राजनीति में स्थायित्व क्षणिक है और परिस्थितियाँ बदलने में देर नहीं लगती।
यह भी सही है कि फिलहाल नीतीश अपने वोटबैंक की मजबूती, बीजेपी की केंद्र सरकार बचाने की मजबूरी और सत्ता हथियाने की बीजेपी की इच्छा—इन तीनों के बीच ’सुरक्षित स्थिति’ में दिखते हैं। परंतु यह सुरक्षा उतनी ही स्थायी है, जितनी राजनीति में अवसरवाद की उम्र होती है। आज तस्वीर यही बताती है कि शाह और नीतीश—इन दोनों में जो पहले खेला करेगा, वही राजनीतिक दौड़ में आगे निकल जाएगा, जबकि दूसरा पक्ष “झोला उठाता” दिख सकता है।
नायडू का फैक्टर—बीजेपी के लिए चुनौती, नीतीश के लिए अवसर
इस पूरी तस्वीर में एक महत्वपूर्ण कड़ी है—आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू। बीजेपी की मुस्लिम विरोधी नीतियों का सीधा असर नायडू के राज्य में दिखता है, जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में होती है। नायडू अपने राज्य की राजनीतिक सामाजिक संरचना को देखते हुए बीजेपी की इस लाइन से दूरी बनाकर चलते हैं। यह दूरी नीतीश और नायडू के बीच सामंजस्य को और मजबूत करती है, क्योंकि दोनों का आपसी संबंध पुराना और भरोसे पर आधारित माना जाता है।
नायडू का हाल ही में केंद्र में लोकसभा अध्यक्ष के पद की मांग करना भी संकेत देता है कि वे अपनी शर्तों पर चलने की स्थिति में हैं। यह बीजेपी के लिए दबाव और नीतीश के लिए अवसर—दोनों है।
विकल्पों का खुला मैदान: महागठबंधन की संभावनाएँ
अगर नीतीश चाहें, तो आज उनके पास एक बहुस्तरीय राजनीतिक विकल्प तैयार है:
नायडू की केंद्र की जरूरतें पूरी कर
चिराग पासवान के ‘बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट’ एजेंडे का संतुलित उपयोग कर
तेजस्वी और निशांत के साथ सामंजस्य बैठाकर
लालू यादव का पूर्ण सहयोग लेकर
वे खुद केंद्र में उच्च पद, या उसके आस-पास की भूमिका के साथ एक मजबूत महागठबंधन सरकार की दिशा में बढ़ सकते हैं।
इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि आज की परिस्थितियाँ नीतीश को NDA से हटकर एक नई राष्ट्रीय धुरी बनाने की ओर प्रेरित कर सकती हैं।
बिहार बनाम दिल्ली: दिशा तय करने वाला क्षण
आज बिहार की राजनीति ऐसी स्थिति में है कि वह न केवल राज्य की, बल्कि देश की राजनीति की दशा और दिशा तय कर सकती है। अगर नीतीश को लगता है कि भविष्य में बीजेपी केंद्र में अकेले जादुई आंकड़ा जुटाने में सफल हो सकती है, तो उनके लिए NDA में बने रहना राजनीतिक जोखिम से भरा कदम होगा।
इसके विपरीत, यदि वे समय रहते अपना “खेला” चल दें, तो वे न केवल बिहार में अपनी स्थिति चट्टान की तरह मजबूत कर सकते हैं, बल्कि केंद्र में भी नई शक्ति-संतुलन के निर्माता बन सकते हैं।
अंतिम निष्कर्ष
राजनीतिक गणित जितना संख्याओं पर आधारित है, उतना ही यह समय, अवसर और “पहली चाल” पर निर्भर करता है।
आज की परिस्थितियाँ यही कहती हैं—
जो पहले खेलेगा, वही आगे बढ़ेगा।
और यह भी सच है कि यदि नीतीश कुमार ने समय रहते अपना कार्ड नहीं खोला, तो भविष्य में जो भी समीकरण बनेगा, उसमें उनका स्थान सुरक्षित नहीं रहेगा।





