गृह मंत्रालय छोडना और बार बार प्रधानमंत्री का चरण स्पर्श करणा- नीतीश का दबाव की राजनीति का शिकार होना या पल्टीमार रणनीति से ध्यान भटकाना है।
नीीव समदर्शी
नीतीश अभी पूरी तरह मोल-भाव की स्थिति में हैं। भाजपा अगर अधिक परेशान करेगी तो वह आसानी से महागठबंधन के साथ मिलकर केंद्र सरकार को न सिर्फ गिरा सकते हैं बल्कि वैकल्पिक सरकार भी बना सकते हैं। क्योंकि चुनावों में लगातार भाजपा से पिटता विपक्ष—खासतौर पर केजरीवाल और ममता बनर्जी—अब ज़्यादा विरोध या परेशानी नहीं झेलना चाहता। मुस्लिम विरोधी नीति के कारण भाजपा से दूर होते मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए नीतीश का साथ देना नायडू सहित अनेक दलों की भी मजबूरी होगी।
ऐसी मजबूत स्थिति में सवाल उठता है कि आखिर नीतीश को झुककर अपने मुस्लिम प्रतिनिधित्व के कोटे में कटौती क्यों स्वीकार करनी पड़ी? हमेशा जिस गृह मंत्रालय को वे अपने पास रखना रणनीतिक रूप से आवश्यक समझते थे, उसे छोड़ना क्यों पड़ा? और फिर यह भी—उन्हें बार-बार प्रधानमंत्री के चरण स्पर्श क्यों करने पड़ रहे हैं जबकि उम्र और अनुभव के लिहाज़ से वे उनके समकक्ष हैं?
क्या यह सब उनकी भावी ‘यू-टर्न रणनीति’ का हिस्सा है, जिसके तहत वे शाह-मोदी को अपनी अगली पलटी मार रणनीति से अनभिज्ञ रखना चाहते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि बार-बार मोदी के चरण स्पर्श से उनके प्रति समर्पण और शाह से विरोध दिखाकर मोल-भाव के बाद प्रधानमंत्री के नाम पर मान जाने का दिखावा कर रहे हैं नीतीश? उनके इन कारनामों को अब उनकी अस्वस्थता से नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि अपने रणनीतिक कौशल से उन्होंने मोदी-शाह को चुनाव पूर्व मंच से जीत के बाद भी “नीतीश कुमार” कहने पर मजबूर कर स्वास्थ्य के मुद्दे को समाप्त कर दिया।
फिर सवाल यह भी है—क्या मामला इससे कहीं गहरा है? कहीं किसी निजी कमजोरी या किसी गोपनीय फाइल के दबाव में नीतीश राजनीतिक ब्लैकमेल के शिकार तो नही हो गए है ?






