——-नीरव समदर्शी
जब गृह मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सौंप दी जाती है और यदि विधानसभा अध्यक्ष का पद नीतीश कुमार के पास ही रहता है — तो इसे सरल रूप से हार या जीत के नज़रिए से नहीं देखा जा सकता है।
अभी भी सामान्य प्रशासन विभाग नीतीश के कुमार के पास ही है जो समी विभागों के पदाधिकारियों का स्थानान्तार्ण नियुक्ति आदि करता है | अध्यक्ष की निर्णायक भूमिका जैसे कारक गहराई से देखने योग्य हैं।
प्रशासनिक नियंत्रण का पहलू
विभागीय रूप से अपराध, सुरक्षा, पुलिस प्रशासन जैसे कार्य अक्सर गृह विभाग से सीधे जुड़े होते हैं। यदि गृह विभाग भाजपा के पास जाता है, परंतु अध्यक्ष पद नीतीश के पास रहता है, तो इसका अर्थ हो सकता है कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन एवं फाइलें मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुँचती रहेंगी।
उदाहरण के तौर पर, भाजपा को गृह मंत्रालय देना यदि नीतीश ने स्वीकार किया है, तब भी यह सोच बनती है कि वे पूरी तरह असमर्थ नहीं हुए हैं — क्योंकि प्रशासनिक नियंत्रण के कई वेंचर्स मुख्यमंत्री के दिशा-निर्देशों या समीकरणों में रह सकते हैं।
इस तरह, इसे सहज “हार” नहीं माना जा सकता क्योंकि नीतीश के हाथ में अभी भी शक्ति के कुछ स्तंभ मौजूद हैं।
राजनीतिक-रणनीतिक खेल और अध्यक्ष की भूमिका
विधानसभा अध्यक्ष का पद सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है; कई बार इसे राजनीतिक खेल का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है — सदन संचालन, बहुमत परीक्षण, नियम-प्रक्रिया में दिशा तय करना आदि में अध्यक्ष की भूमिका होती है।
देखना यह है कि अध्यक्ष पद जदयू कोटे में आता है या नहीं। अगर यह पद भाजपा को नहीं जाता है, तो नीतीश ने यह सुनिश्चित किया होगा कि खेल पूरी तरह भाजपा-इतर राजनीतिक धुरी पर न चले।
इस दृष्टि से उनका निर्णय दूरगामी भी माना जा सकता है — क्योंकि वे पदों का बंटवारा करते हुए भी केंद्रीय नियंत्रण, या कम-से-कम “देखने-सुनने” की स्थिति बनाए रखना चाह रहे हैं।
अपराध-वृत्तांत का उल्टा असर
गहराई से देखने पर यह माना जा सकता है कि जब से सम्राट चौधरी
उपमुख्यमंत्री बने हैं, तब से राज्य में अपराध-दर पहले की तुलना में बढ़ी है।
यदि गृह विभाग भाजपा को जाता है, लेकिन अपराध-मामलों में सुधार नहीं मिलता है, तो जनता व विपक्ष के नज़रिए से यह “सुपुर्दगी” का संकेत बन सकता है — कि भाजपा ने गृह विभाग संभाला लेकिन बेहतर परिणाम नहीं दिए। इस तरह भाजपा पर दबाव बढ़ेगा।
इसके अलावा सम्राट चौधरी के आपराधिक मामले भी भाजपा को कटघरे में खड़ा करेंगे।
नीतीश लॉबी के लिए यह सिद्ध करना आसान होगा कि नीतीश के सुशासन को भाजपा ने नष्ट किया। साथ ही यह भी कि कभी भी पाला बदलने के लिए नीतीश के पास धारदार तर्क मौजूद रहेंगे।
सब अच्छा रहा तो संदेश यही जाएगा — “नीतीश के नेतृत्व में सब बेहतर है।”






