पटना/प्रतिनिधि (मालंच नई सुबह)बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार सत्यनारायण के निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर है।उन्होंने पटना के कदमकुआँ स्थित अपने आवास पर गत मध्यरात्रि अंतिम सांस ली। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन से भी जुड़े रहे तथा बिहार हिन्दी प्रगति समिति के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहे।
सत्यनारायण की सबसे बड़ी पहचान ‘मेरे भारत के कंठहार, तुझको शत-शत वंदन बिहार’ के रचनाकार के रूप में है। बिहार सरकार ने इस रचना को मार्च 2012 में राज्य गीत के रूप में आधिकारिक रूप से अपनाया था।
उनका साहित्यिक व्यक्तित्व केवल राज्य गीत तक सीमित नहीं था। वे हिन्दी नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर माने जाते रहे। उनकी रचनाओं में आम आदमी का जीवन, सामाजिक सरोकार, राजनीतिक चेतना और जन-संघर्ष प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। आलोचकों ने उनके गीतों की सहज भाषा और समकालीन जीवन-बोध को उनकी रचनात्मक विशेषता माना है।
जेपी आंदोलन से भी रहा गहरा जुड़ाव
सत्यनारायण केवल साहित्य की दुनिया तक सीमित कवि नहीं थे। 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान उन्होंने नुक्कड़ कवि के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई। पटना के विभिन्न नुक्कड़ों पर कविता-पाठ के माध्यम से उन्होंने जनजागरण में भाग लिया। बिहार सरकार के राजभाषा विभाग ने भी उन्हें 2020-21 के नागार्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था।
उनकी रचनात्मक यात्रा छह दशकों से अधिक समय तक चली। प्रकाशित प्रमुख कृतियों में ‘तुम ना नहीं कर सकते’, ‘टूटते जल-बिंब’, ‘सभाध्यक्ष हँस रहा है’, ‘सुनें प्रजाजन’ और ‘स्मृतियों में’ उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ‘धरती से जुड़कर’ का संपादन भी किया तथा ‘नुक्कड़ कविता’ पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे।
साहित्यिक मंचों पर उनकी सक्रियता अंतिम वर्षों तक बनी रही। 2023 में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के महाधिवेशन में भी उन्होंने कवि-सम्मेलन का उद्घाटन किया था। उस अवसर पर उन्हें बिहार-गीत के रचयिता और हिन्दी प्रगति समिति, बिहार के अध्यक्ष के रूप में संबोधित किया गया था।
नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत के भी रचनाकार
सत्यनारायण ने बिहार की सांस्कृतिक पहचान को अपनी रचनाओं में स्वर देने के साथ-साथ नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की। उनके साहित्यिक योगदान के लिए बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उपलब्ध स्रोतों में गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार तथा अन्य साहित्यिक सम्मानों का भी उल्लेख मिलता है।
उनके निधन की सूचना ऐसे समय में आई है जब 13 सितंबर को उनके जन्मदिवस के अवसर पर बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उनके अभिनंदन तथा उनके साहित्य पर केंद्रित पुस्तक के लोकार्पण की तैयारी की जा रही थी। यदि परिवार और सम्मेलन की ओर से इसकी पुष्टि होती है, तो यह संयोग उनके निधन को और अधिक मार्मिक बना देता है। उस अवसर को अब श्रद्धांजलि सभा में परिवर्तित किए जाने की संभावना है।
साहित्य जगत की ओर से बिहार सरकार से मांग उठ रही है कि राज्य गीत के रचयिता और बिहार की साहित्यिक अस्मिता को महत्वपूर्ण स्वर देने वाले इस वरिष्ठ साहित्यकार के अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान प्रदान किया जाए।




