पटना / प्रतिनिधि मालंच नई सुबह,) पटना। अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा-मंच का बहुप्रतीक्षित 30वाँ संस्करण लघुकथा 27- 28 दिसंबर को पटना के राजेंद्र नगर स्थित किलकारी बिहार बाल-भवन में संपन्न हुआ।
लघुकथा मंच के संस्थापक एवं अपने अभूतपूर्व प्रयासों से बिहार सहित पूरे उत्तर भारत में लघुकथा को प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्व. सतीशराज पुष्करणा को समर्पित इस सम्मेलन में 21वीं सदी के शुरुआती 25 वर्ष की यात्रा का सार्थक विमर्श सामने आया। यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया कि सतीशराज पुष्करणा की स्मृति में विश्व लघुकथा कोश सहित दर्जन भर लघुकथा कोश सृजन करने सहित अनेक पुस्तकों से लघुकथा जगत को समृद्ध करने वाले देश के शीर्ष लघुकथाकार दिल्ली निवासी बलराम को प्रथम सतीशराज पुष्करणा लघुकथा शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें सम्मान राशि 25 हजार रुपए के साथ अंगवस्त्र, सम्मान पत्र, स्मृति चिह्न भी प्रदान किए गए। श्री बलराम के अतिरिक्त बोकारो झारखंड की डॉ आशा पुष्प को सतीशराज पुष्करणा लघुकथा समालोचना सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें 15 हजार की सम्मान राशि प्रदान की गई। बेगूसराय के सुमन कुमार को सतीशराज पुष्करणा लघुकथा युवा सम्मान और पटना के बाल लघुकथाकार अनुराग कुमार को सतीशराज पुष्करणा लघुकथा नवांकुर सम्मान से सम्मानित किया गया। सुमन और अनुराग को क्रमशः 11 हजार और 5 हजार रुपए सम्मान राशि प्रदान की गई।
सम्मेलन आयोजन स्थल पर डॉ. पुष्करणा की लघुकथाओं की पोस्टर प्रदर्शनी, पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। उद्घाटन सत्र में सतीशराज पुष्करणा पर केंद्रित स्मृति- ग्रंथ ” हिंदी लघुकथा के प्रथम पुरुष: सतीशराज पुष्करणा (संपादक : डॉ ध्रुव कुमार) ” सहित आधा दर्जन लघुकथा विषयक पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। इनमें तारीक असलम तस्नीम की ‘जन्नत’, चितरंजन भारती की ‘पीछा करती दृष्टि, कल्याणी कुसुम सिंह की ” घटती जिंदगी, बढ़ती लालसाएँ “, कल्याणी कुसुम सिंह का शोध प्रबंध ” सतीश राज पुष्करणा लघुकथाओं में जीवन के विभिन्न आयामों का शोधात्मक अध्ययन”, डॉ. विद्या चौधरी की ‘जीवन का मुहल्ला’ और डॉ. सतीश चन्द्र भगत की बज्जिका लघुकथा का संग्रह ‘माटी के करजा’ शामिल हैं। साथ ही सम्मेलन के अवसर पर प्रकाशित विशेष पुस्तिका का लोकार्पण किया गया।
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए बिहार विधान परिषद के उप सभापति एवं पटना विश्वविद्यालय हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रामवचन राय ने कहा कि लघुकथा भी कहानी का काम करती है। कहानी के भीतर लघुकथा मानो नैनो साइंस की तरह है। कहानी में आरंभ, विकास, उत्कर्ष और अंत होता है। पर लघुकथा में कभी-कभी आरंभ पर ही अंत हो जाता है। यही शैली का अंतर इसे लघुकथा बनाती है। आज लघुकथा समय की जरुरत बन गई है। इसमें विस्तार में न जाकर संक्षेप में बात होती है। यह इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष नंदकिशोर यादव ने कहा कि लघुकथा साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसमें कम शब्दों में क्षण की घटना को लिखा जाता है। कम शब्दों में लिखना आसान काम नहीं है। लोगों के पास समय का अभाव है, उन्हें लंबी कहानियाँ- उपन्यास पढ़ने का समय नहीं है। इसलिए आज के दौर में लघुकथा एक प्रचलित विधा बनती जा रही है। इस विधा को शिखर पर ले जाने के लिए अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा- मंच के प्रयासों की सराहना की।
पटना की मेयर श्रीमती सीता साहू ने कहा कि लघुकथा संवेदना की गहराइयों को नापती है और कुछ प्रश्न हमारे भीतर छोड़ जाती है। आज के दौर के लेखकों की कलम यथार्थ को चित्रित करती है और उनके लिखे शब्दों को पढ़कर- सुनकर समाज बदलाव की ओर अग्रसर होता है।
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव एवं उर्दू कहानीकार प्रो. डॉ. अबू बकर रिज़वी ने कार्यक्रम की सफलता की बधाई देते हुए कहा कि सम्मेलन में यहाँ उपस्थित सारे साहित्यकार अपने आप में आफ़ताब और महताब हैं। उन्होंने मंच के कार्यक्रम को देखकर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की।
नई धारा के संपादक प्रो. (डॉ.) शिवनारायण ने लघुकथा- मंच के संस्थापक डॉ. सतीशराज पुष्करणा के साहित्यिक अवदान की चर्चा करते हुए लघुकथा आंदोलन में उनकी भूमिका की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि पुष्करणा जी ने पटना को लघुकथा का महागढ़ बनाया और लघुकथाकारों की कई पीढ़ियाँ तैयार कर दी। पुष्करणा जी ने पटना के महेंद्रू को लघुकथा नगर के रूप में स्थापित किया। डॉ. शिवनारायण ने हर्ष व्यक्त करते कहा कि 7 वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित 30वें लघुकथा सम्मेलन के आयोजन से पुष्करणा जी की परम्परा और पुरानी लौ पुनः जीवंत हो उठी है।
लघुकथा मंच के महासचिव डॉ. ध्रुव कुमार ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि उत्तरप्रदेश के बरेली निवासी सतीशराज पुष्करणा ने 1987 में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा-मंच को पटना में स्थापित कर लघुकथा आंदोलन को नई दिशा दी और लघुकथा को कहानी विधा से अलग कर एक स्वतंत्र विधा स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1988 से ही लघुकथा – सम्मेलन आयोजित करना प्रारंभ किया। अबतक इसके तीस संस्करण आयोजित हो चुके हैं। उन्होंने अपने प्रतिवेदन में आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए लघुकथा- मंच के अध्यक्ष डॉ. रामदुलार सिंह ‘पराया’ ने कहा कि हमें विवादों से हटकर कालजयी रचना की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने मंच के प्रयासों पर हर्ष व्यक्त किया और कहा कि वरिष्ठों और युवा के साथ नवांकुर को भी सम्मानित करने का यह कदम अनुकरणीय है। संचालन डॉ. सी.रा. प्रसाद एवंधन्यवाद ज्ञापन किलकारी की निदेशक ज्योति परिहार ने किया।
28 दिसम्बर के प्रथम सत्र में प्रथम सतीशराज पुष्करणा लघुकथा शिखर सम्मान से सम्मानित श्री बलराम पर केंद्रित विशेष सत्र ’75 के बलराम’ आयोजित किया गया, जिनमें श्री बलराम के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत चर्चा की गई।
डॉ. शिवनारायण ने कहा कि पाटलिपुत्र ऐसी धरती जहाँ सम्मान पाकर साहित्यकारों को अत्यधिक गर्व का अनुभव होता है। दिल्ली के बलराम जी को यहां सम्मानित होते हुए देखना बड़ी प्रसन्नता की बात है। कानपुर, उत्तर प्रदेश के भाऊपुर माधौसिंह गांव में 15 नवम्बर, 1951 को जन्में बलराम प्रेम नारायण 54-55 वर्षों से हिंदी लघुकथा के संघर्ष के साक्षी हैं। उन्होंने मृणजल, रुकी हुई हंसनी (सन्मार्ग प्रकाशन, नई दिल्ली) एवं मसीहा की आंखें (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) लघुकथा संग्रहों के अलावा हिंदी लघुकथा कोश, भारतीय लघुकथा कोश (दो खंडों में), विश्व लघुकथा कोश (चार खंडों में), बीसवीं सदी की लघुकथाएं (चार खंडों में) लघुकथा की जमीन को और भी ठोस और मजबूत करने वाला ” न भूतो न भविष्यति ” कार्य है। उनकी पांच पुस्तकें लघुकथा लहरी, छोटी-बड़ी कथाएं, लघुकथा कौस्तुभ, लघुकथा कुंज और कालजयी लघुकथाएं मंगलौर विश्वविद्यालय, कर्नाटक के विभिन्न पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। देश के शीर्ष लघुकथाकार होने के साथ- साथ वे एक पत्रकार, कथाकार, समीक्षक एवं संपादक भी हैं। उनका अकादमिक योगदान भी कम नहीं है। कानपुर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले बलराम लंबे समय तक एनसीईआरटी की पाठ्यक्रम समिति में भी रहे और जर्मनी (फ्रैंकफर्ट) में भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व भी किया है। इन दिनों देश की राजधानी दिल्ली में रह कर साहित्य की साधना कर रहे हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. भगवती प्रसाद द्विवेदी ने बलराम के लघुकथा -कर्म पर विस्तृत चर्चा की और कहा कि उनका लघुकथा- संसार व्यापक फलक को समेटे हुए है। उनकी भाषा में प्रवाह है। व्यंग्य की चुभन, आंचलिक संवाद और नवाचार उनके लघुकथाओं की विशेषताएँ हैं। बलराम बाल- मनोविज्ञान के भी कुशल पारखी हैं।
रायपुर, छत्तीसगढ़ के डॉ. महेंद्र ठाकुर ने बलराम के संपादन और पत्रकारिता पर बात रखते हुए कहा कि बलराम न केवल एक शीर्ष लघुकथाकार- साहित्यकार हैं, बल्कि वे एक कुशल समाचार- पत्र के संपादक भी रहे हैं। उनके लिखे संपादकीय ने सरकार, प्रशासन और समाज की सच्चाइयों उजागर कर, आम आदमी को हिम्मत दी है, न्याय दिलाया है।
श्री बलराम ने लघुकथा मंच का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि लघुकथा को अन्य विधाओं की तरह प्रतिष्ठा मिले, यही हमारी कोशिश रही है। उन्हें खुशी और संतोष है कि पुष्करणा जी के साथ मिलकर हमने काम किया। पुष्करणा जी ने लघुकथा आलोचना को भी समृद्ध किया और लघुकथा को साहित्य की एक स्वतंत्र विधा बनने में महत्वपूर्ण योगदान किया।
दूसरे सत्र में ‘लघुकथा के सिद्धांत पक्ष पर विमर्श: लघुकथा बहस के चौराहे पर’ पर विद्वानों ने अपने शोध- आलेख प्रस्तुत किए। इस सत्र की अध्यक्षता हरियाणा की वरिष्ठ लघुकथाकार शील कौशिक ने की।
नागपुर, महाराष्ट्र के डॉ मिथिलेश अवस्थी ने कहा कि किसी भी विधा के लिए शिल्प- पक्ष बहुत महत्वपूर्ण है। लघुकथा में आकार को लेकर अपनी बातें रखते हुए कहा कि प्रत्येक लघुकथाकार को अपनी रचनाएँ अपने से श्रेष्ठ लघुकथाकारों से एक बार अवश्य दिखवा लेनी चाहिए। उन्होंने लघुकथा को एक निश्चित विषय के अंतर्गत रखने को ध्यान आकर्षित किया और कहा कि समीक्षक को भी ईमानदारी से किन्हीं दूसरे रचनाकारों की लघुकथाओं पर अपनी बात रखनी चाहिए।
लघुकथा पर शोध कर 1991 में पी-एच.डी की उपाधि ग्रहण करने वाली बोकारो, झारखंड की डॉ. आशा पुष्प ने कहा कि लेखकों की लिखी बात पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए। कथानक स्पष्ट हो। लघुकथा पहली पंक्ति से ही आकर्षक होनी चाहिए, ताकि पाठक बँधा रह सके। उन्होंने लघुकथा में नए प्रयोग की ओर ध्यान आकर्षित किया और कहा कि एक अच्छी लघुकथा क्षिप्रता लिए होती है, क्षणीक अनुभूति ही लघुकथा है। लघुकथाएँ लंबी नहीं होनी चाहिए।
डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज ने कहा कि लघुकथा लिखना आसान काम नहीं है। उन्होंने लघुकथा के सिद्धांत पक्ष पर गहराई से बातें रखीं।
लघुकथाकार सिद्धेश्वर से कहा कि आज लोगों के दोहरे मानदंड सामने आ रहे हैं। नए और गुमनाम लेखकों को वरीय लोग हतोत्साहित करते हैं। प्रतिष्ठित लेखक अगर बड़ी और लंबी लघुकथाएँ लिखता है, तो समीक्षक उसे लघुकथा मान लेते हैं, जबकि उतनी ही बड़ी लघुकथा का सृजन युवा और नए करते हैं, तो समीक्षक उनकी लघुकथाओं को लघुकथा मानने को तैयार नहीं होते— यहाँ उनका दोहरा रुप देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि लघुकथा इतनी लंबी न हो कि वह कहानी या फिर लघु कहानी बन जाए।
ऋचा वर्मा ने कहा कि कथ्य प्रभावपूर्ण होना चाहिए। संवाद लघुकथा को रोचक बनाते हैं। रचनाकार केवल सृजन करता है, पर वह रचना पाठक पर निर्भर करता है और वही इसका फलक की सीमा तय करता है।
शील कौशिक ने अपने अध्यक्षीय भाषण में लघुकथा के पितामह डॉ. सतीशराज पुष्करणा को याद करते हुए कहा कि आठवें दशक से आजतक के आयामों में लघुकथा अब कई रूपों में परिवर्तन हुई है। लघुकथा का अंत सांकेतिक रूप से अनकहा, गहनतम हो, पर संवेदनापरक हो। मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक लघुकथाएँ आज लिखी जा रही हैं, यह पाठकों की समृद्धि के संकेत हैं। नए प्रयोगों से लघुकथा को बल मिले, न कि उस विधा कमजोर करे। भाषा का संस्कार वास्तव में लघुकथा को ऊँचाई देता है।
उन्होंने कहा कि हमारी संवेदना अंदर से फूटनी चाहिए और वह लघुकथा में दिखनी चाहिए, तभी कोई रचनाकार लघुकथा के मानदंडों पर खड़ा उतर सकता है। उन्होंने कहा कि आलोचना विधा केंदित होनी चाहिए, व्यक्ति केंद्रित नहीं होनी चाहिए। संचालन बी आर आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय की शोधार्थी
डॉ. रजनी प्रभा ने किया।
तीसरे सत्र में ‘लघुकथा के रचना पक्ष: लघुकथा का देस- देशांतर’ पर शोध -आलेख प्रस्तुत किए गए। अध्यक्षता डॉ. महेंद्र ठाकुर ने की। लघुकथा शोध केंद्र समिति,भोपाल की निदेशक और वरिष्ठ लघुकथाकार कांता राय ने अपने संस्थान के जरिए लघुकथा पर हो रहे कार्य- संकल्पों को बताया। समिति द्वारा विभिन्न क्षेत्रों की सभी भाषाओं में लघुकथाओं की पुस्तक तैयार करने की बात कही। किन्नरों की संवेदनाओं को भी लघुकथा में लाने को कहा। रचनात्मकता, सैद्धांतिक पक्ष को लेकर विस्तृत बातें रखीं। उन्होंने कहा कि प्रथम पुरुष पर बहस निराधार है, क्योंकि प्रथम पुरूष अपने काल और कर्म से बनता है। इसलिए डॉ. सतीशराज पुष्करणा ही लघुकथा के प्रथम पुरूष हैं।
चितरंजन भारती ने देस – देशांतर माध्यम से हम विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति को लघुकथाओं में कैसे ला- उतार सकते हैं, उसे विस्तार दे सकते हैं— इस पर बल दिया। लघुकथाकार रामयतन यादव ने कहा कि साहित्यकारों के बीच वाद- विवाद – संवाद होते रहते हैं, बड़ी बात है उससे परे सृजन चलता रहे। पूनम कतरियार ने लघुकथा के सौंदर्य -शास्त्र पर अपनी बात रखी। लघुकथा लेखन में न सिर्फ बाहरी ढाँचा बल्कि आतंरिक सृजन और उद्देश्य भी जरूरी हो जाता है। लघुकथा का मर्म लघु या क्षणकालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक होता है। डॉ. सी. रा. कहा कि पाठकों की प्रतिक्रियाएँ लेखन को आँकने का एक जरिया है। प्रभात वर्मा ने मगही भाषा की लघुकथा बल देते हुए मगही में ही अपना वक्तव्य दिया वहीं डॉ. सतीश चंद्र भगत ने अपनी बज्जिका भाषा की लघुकथाओं पर बात कही। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. महेंद्र ठाकुर ने की।
समापन सत्र में बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा श्रीमती अप्सरा झा ने महिला विमर्श पर बेबाकी से अपनी राय रखी और लघुकथा -मंच को नारी-विमर्श पर कार्यक्रम आयोजित करने पर आयोग से सहायता देने का भरोसा दिया।
समापन सत्र में श्री बलराम, बिहार राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती अप्सरा और समाजसेवी डॉ. आनन्द मोहन झा ने देशभर से पधारों लघुकथाकारों को अंग-वस्त्र, प्रतीक -चिह्न और बैग आदि देकर विदा किया। धन्यवाद ज्ञापन आलोक चोपड़ा ने किया।
सम्मेलन में डॉ रमेश कुमार, डॉ मेजर शक्तिराज, फजल इमाम मल्लिक, विभा रानी श्रीवास्तव, आभा रानी, नीरजा कृष्णा, प्रवीण श्रीवास्तव, पूनम आनंद, पूनम कतरियार, प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र, सीमा रानी, प्रीति गुप्ता, रेखा भारती मिश्रा, रूबी भूषण, एकता कुमारी, अनीता ठाकुर, सम्राट समीर, श्रेया, मिन्नी मिश्रा, डॉ अनीता सिद्धि, वंदना देव, लता पराशर, अहमद रजा हाशमी, अविनाश बंधु, पंकज प्रियम, गार्गी राय, कमला कांत पांडेय, संजय राय, मीना परिहार, अभिलाष दत्त आदि प्रमुख लघुकथाकारों ने शिरकत की।






