मालंच नई सुबह

सच हार नही सकता

साहित्य

*नए साल का एहसास*

डॉ.अर्चना त्रिपाठी

सहायक प्राध्यापक (हिंदी)पटना

पटना  बिहार

जीवन के स्टेशन से मानो आहिस्ता आहिस्ता

 

सांस की रेल खिसक रही

 

इस वर्ष का वक्त वैसे ही

सरक रहा था

 

नए वर्ष के आने की आहट

 

हौले हौले मन को गुदगुदा रही थी

 

जैसे पी के घर जाने की

 

खुशी के साथ बाबुल के घर के

 

छूटने की कसक सी

 

साल का जाना

 

साल रहा था

 

खट्टी, मीठी, तीती यादों के साथ

 

नए गुलों के खिलने की आस

 

खिली धूप की नरमी सी, सिहरन

 

सिहरा रही मन,

 

मदहोश कर रही तन को

 

कह रही रहो सब मिलकर

 

भूल जाओ सब गमों को

चलती ट्रेन से, छूटते साथी के हाथ सा

 

छूट रहा साथ

 

जाते साल का

 

होठों पर तैरे मुस्कान सा

 

नया साल आ रहा था

 

क्योंकि जब कभी मैं मुस्कुराना चाही

 

रो पड़ी याद कर गमों को

 

यह ऐसी पगडंडी सी है जिस पर

 

चलना है सबों को

 

पर एक उम्मीद है मिल जाए शायद कुछ

 

आराम के चबूतरे जहां ठहर,

 

खुशियों की जम्हाई ले

 

कुछ सुकून के क्षण

 

बिता सकें यही है तमन्ना

 

नए वक्त के आने से नए वर्ष में नए वर्ष में

 

 

 

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