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सच हार नही सकता

सम्पादकीय

नेहा झा प्रकरण : 75 लीटर शराब से बड़ा सवाल—मजबूरी, परिवार या शराबबंदी की व्यवस्था में सेंध?

 

 

नीरव  समदर्शी

बिहार में शराबबंदी को लेकर सरकार की नीति और उसके क्रियान्वयन पर बहस कोई नई बात नहीं है। लेकिन समस्तीपुर में स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस के प्रथम श्रेणी वातानुकूलित कोच से 25 वर्षीय नेहा झा के पास से करीब 75 लीटर विदेशी शराब की बरामदगी ने इस बहस को एक बार फिर नए सवालों के सामने खड़ा कर दिया है। मामला इसलिए भी चर्चा में है कि शराब कोई सामान्य ट्रेन डिब्बे से नहीं, बल्कि फर्स्ट एसी के एक कूपे से बरामद हुई और युवती अपने एक रिश्तेदार ईशान के साथ यात्रा कर रही थी। दोनों को गिरफ्तार किया गया है।

लेकिन इस घटना की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बरामद शराब से ज्यादा चर्चा अब नेहा के चेहरे, उसके आत्मविश्वास, उसके परिवार और सोशल मीडिया पर उसके बारे में गढ़ी जा रही कहानियों की हो रही है। कहीं उसे ‘शराब तस्करी की क्वीन’ बताया जा रहा है, कहीं ‘फैमिली बिजनेस’ की सदस्य और कहीं उसकी कथित ‘मजबूरी’ की कहानी तलाशने की कोशिश हो रही है।

क्या सचमुच यह एक युवती की कहानी है, या इसके पीछे बिहार की शराबबंदी व्यवस्था की कोई बड़ी कहानी छिपी है?

यही वह सवाल है जिसे सनसनी से अलग करके देखने की जरूरत है।

75 लीटर शराब : घटना छोटी नहीं

सबसे पहले उन तथ्यों पर आएं जिन पर विवाद अपेक्षाकृत कम है। स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस के एच-1 कोच के एक कूपे में तलाशी के दौरान दो सूटकेस से लगभग 75 लीटर विदेशी शराब बरामद होने की बात पुलिस और कई समाचार रिपोर्टों में सामने आई है। कार्रवाई समस्तीपुर स्टेशन पर आरपीएफ, सीआईबी और रेल पुलिस की मौजूदगी में हुई।

यह मात्रा इतनी कम नहीं है कि इसे व्यक्तिगत उपयोग कहकर आसानी से टाला जा सके। बिहार में शराबबंदी लागू है। दूसरे राज्य से इतनी बड़ी मात्रा में शराब लेकर बिहार में प्रवेश करना इसलिए गंभीर मामला है।

लेकिन गंभीरता का अर्थ यह नहीं कि जांच का निष्कर्ष पहले ही तय कर लिया जाए।

कानून अपना काम करेगा। अदालत यह तय करेगी कि आरोप किस सीमा तक प्रमाणित होते हैं। पत्रकारिता का काम इससे पहले यह देखना है कि घटना के पीछे की पूरी कड़ी क्या है।

नेहा का ‘शादी’ वाला बयान और पुलिस की आशंका

पूछताछ के दौरान नेहा ने कथित तौर पर पुलिस को बताया कि शराब शादी समारोह के लिए लाई जा रही थी और इसे हरियाणा से खरीदा गया था। पुलिस इस बयान को अंतिम सत्य नहीं मान रही और शराब की वास्तविक मंजिल तथा संभावित नेटवर्क की जांच कर रही है।

यहीं से कहानी में दो संभावनाएं बनती हैं।

पहली—नेहा का बयान सही हो और मामला किसी निजी आयोजन के लिए शराब लाने तक सीमित हो।

दूसरी—शादी का उल्लेख जांच को भटकाने का प्रयास हो और शराब किसी खरीदार या नेटवर्क तक पहुंचाई जानी हो।

दोनों में से कौन सही है, इसका फैसला जांच से होगा, न कि टीवी की बहस या सोशल मीडिया की टिप्पणियों से।

इसलिए इस समय यह कहना कि ‘नेहा ने मजबूरी में शराब तस्करी शुरू की’ भी उतना ही जल्दबाजी भरा होगा जितना यह कहना कि ‘वह शराब तस्करी की क्वीन है।’

मजबूरी का कोई ठोस प्रमाण अभी सामने नहीं आया है।

परिवार का अतीत—महत्वपूर्ण सुराग, लेकिन अपराध का प्रमाण नहीं

मामले को गंभीर बनाने वाला दूसरा पहलू नेहा का पारिवारिक संदर्भ है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार उसके पिता पहले शराब से जुड़े मामले में गिरफ्तार हो चुके हैं और उसकी बहन के खिलाफ भी शराब से संबंधित मामला दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।

यहीं से कुछ मीडिया रिपोर्टों ने ‘फैमिली बिजनेस’ जैसे निष्कर्ष निकाल दिए।

लेकिन क्या किसी परिवार के एक सदस्य का कथित अपराध दूसरे सदस्य के अपराध का प्रमाण बन सकता है?

नहीं।

यदि पिता के खिलाफ मामला है तो उसका अपना कानूनी परिणाम होगा। यदि बहन के खिलाफ मामला है तो उसका भी अपना। नेहा के मामले का फैसला उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों से ही होना चाहिए।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि रेल पुलिस के अनुसार नेहा के खिलाफ पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं मिला है।

यह तथ्य उसकी वर्तमान गिरफ्तारी को समाप्त नहीं करता, लेकिन यह जरूर बताता है कि जांच में पुराने पारिवारिक मामलों और नेहा की व्यक्तिगत भूमिका को अलग-अलग रखना चाहिए।

क्या परिवार की पृष्ठभूमि संयोग है या नेटवर्क का संकेत?

दूसरी ओर, परिवार से जुड़े पुराने शराब मामलों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

यदि एक ही परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ अलग-अलग समय में शराब तस्करी के मामले सामने आए हैं तो पुलिस के लिए यह जांच का स्वाभाविक कोण है कि क्या इनके बीच कोई संपर्क या नेटवर्क था।

लेकिन ‘जांच का कोण’ और ‘अपराध सिद्ध होना’ दो अलग बातें हैं।

पुलिस को यह पता करना होगा कि नेहा के पास शराब किसने पहुंचाई? हरियाणा में किससे खरीदी गई? भुगतान किसने किया? बिहार में किसे पहुंचानी थी? क्या इससे पहले भी इसी तरह की खेप लाई गई? मोबाइल फोन में किन लोगों से बातचीत हुई? बैंक या डिजिटल भुगतान में क्या संकेत मिलते हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर ही बताएंगे कि यह एक अलग घटना थी या किसी बड़े नेटवर्क की एक कड़ी।

फर्स्ट एसी का कूपा : शराबबंदी पर सबसे असहज सवाल

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद नेहा नहीं, बल्कि फर्स्ट एसी का कूपा है।

बिहार में शराबबंदी है। सीमावर्ती राज्यों से शराब की तस्करी रोकने के लिए पुलिस, उत्पाद विभाग और अन्य एजेंसियां लगातार अभियान चलाती हैं। इसके बावजूद शराब राज्य में पहुंच रही है।

कभी कार से, कभी ट्रक से, कभी बस से, कभी बाइक से और अब फर्स्ट एसी के कूपे से।

तो सवाल केवल यह नहीं है कि नेहा पकड़ी गई।

सवाल यह भी है कि शराबबंदी के इतने वर्षों बाद भी शराब बिहार की सीमा के भीतर पहुंच कैसे रही है?

हर पकड़ी गई खेप सरकार के लिए सफलता का प्रमाण हो सकती है, लेकिन हर बरामदगी यह सवाल भी पैदा करती है कि जो खेप पकड़ी नहीं गईं, उनका क्या हुआ?

शराबबंदी की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल गिरफ्तारियों और बरामद बोतलों की संख्या नहीं हो सकता। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब तस्करी का नेटवर्क कमजोर हो, सप्लाई चेन टूटे और शराब की मांग तथा अवैध बाजार दोनों पर प्रभाव पड़े।

तस्कर कौन है, लेकिन खरीदार कौन है?

शराब तस्करी पर चर्चा करते समय हम अक्सर वाहक तक रुक जाते हैं।

जो सूटकेस लेकर पकड़ा गया, वही खबर बन जाता है।

लेकिन शराब का धंधा केवल वाहक से नहीं चलता।

कहीं न कहीं उत्पादन या खरीद है। कहीं परिवहन है। कहीं भंडारण है। कहीं वितरण है। और सबसे अंत में खरीदार है।

यदि नेहा केवल एक वाहक थी, तो उसे शराब किसने दी?

यदि वह नेटवर्क का हिस्सा थी, तो नेटवर्क में उसके ऊपर कौन था?

यदि शराब शादी के लिए थी, तो इतनी मात्रा की जरूरत क्यों थी और उसके दस्तावेज या वैध स्रोत क्या थे?

और यदि पुलिस को किसी बड़े ग्राहक या नेटवर्क की आशंका है तो वह ग्राहक कौन है?

जब तक इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता, केवल नेहा को केंद्र बनाकर पूरी कहानी कहना अधूरी मीडिया एथिक्स  के विरुद्ध है मानी जानी चाहिए।

‘मॉडल’, ‘क्वीन’, ‘मैडम’—क्या ये खबर के शब्द हैं?

इस प्रकरण का एक दूसरा पहलू मीडिया की भूमिका से जुड़ा है।

नेहा के रूप-रंग और उसके कथित आत्मविश्वास को खबर का हिस्सा बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर उसके लिए ‘क्वीन’, ‘मैडम’ जैसे विशेषण इस्तेमाल हो रहे हैं।

यह पत्रकारिता के लिए ही नहीं सम्पूर्ण बौद्धिक समाज के लिए भी चिंताजनक प्रवृत्ति है।

यदि कोई पुरुष शराब की 75 लीटर खेप के साथ पकड़ा जाए तो खबर का केंद्र सामान्यतः शराब, नेटवर्क और पुलिस जांच होती है। महिला होने पर अचानक चेहरा, पहनावा, व्यवहार और निजी जीवन खबर के केंद्र में क्यों आ जाता है?

अपराध का कोई लिंग नहीं होता।

यदि नेहा दोषी है तो साक्ष्य के आधार पर दोषी है। यदि जांच में वह निर्दोष साबित होती है तो सोशल मीडिया की बनाई छवि उसके जीवन पर स्थायी दाग बन सकती है।

इसलिए मीडिया को सनसनी और तथ्य के बीच की सीमा नहीं भूलनी चाहिए।

मजबूरी की कहानी कहां से आई?

इस मामले में ‘मजबूरी’ शब्द भी खूब घूम रहा है। लेकिन अब तक उपलब्ध रिपोर्टों में नेहा की ओर से ऐसी कोई स्पष्ट बात प्रमाणित नहीं होती कि उसने आर्थिक संकट या पारिवारिक मजबूरी के कारण शराब ढोने की बात स्वीकार की हो।

बल्कि उसका कथित बयान शादी समारोह से जुड़ा है।

इसलिए आर्थिक मजबूरी की कहानी गढ़ना उचित नहीं।

हां, यदि आगे जांच में उसके आर्थिक हालात, किसी व्यक्ति के दबाव, कर्ज, धमकी या किसी अन्य मजबूरी का प्रमाण मिलता है तो वह कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा।

लेकिन ‘हो सकता है’ को ‘है’ बना देना सबसे खतरनाक गलती है।

क्या शराबबंदी केवल गरीब और छोटे वाहक तक सीमित है?

इस घटना से शराबबंदी के एक पुराने प्रश्न को भी फिर से सामने लाना चाहिए।

बिहार में शराब की आपूर्ति के लिए अगर कोई नेटवर्क दूसरे राज्यों से महंगी विदेशी शराब खरीदता है, तो उसमें पूंजी चाहिए। परिवहन चाहिए। संपर्क चाहिए। ग्राहक चाहिए। जोखिम उठाने वाले लोग चाहिए।

फिर सवाल उठता है—क्या पूरी कार्रवाई केवल उस व्यक्ति तक पहुंचती है जो बोतल लेकर चलता है?

अगर ऐसा है तो शराब का बाजार कभी पूरी तरह खत्म नहीं होगा।

नीचे की कड़ी पकड़ी जाएगी, ऊपर की कड़ी बदल जाएगी।

एक व्यक्ति जेल जाएगा, दूसरा उसकी जगह लेगा।

इसलिए शराबबंदी की वास्तविक परीक्षा यह है कि सप्लाई चेन के शीर्ष तक जांच पहुंचती है या नहीं।

नेहा के मामले में पुलिस को क्या करना चाहिए?

इस मामले में पुलिस की जांच का दायरा व्यापक होना चाहिए।

मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान, यात्रा की पूरी श्रृंखला, शराब की खरीद का स्थान, सप्लायर, संभावित खरीदार, ट्रेन तक शराब पहुंचाने वाला व्यक्ति और बिहार में उसकी प्रस्तावित डिलीवरी—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।

साथ ही परिवार के पुराने मामलों की भी जांच हो, लेकिन केवल संबंध के आधार पर किसी को आरोपी न बनाया जाए।

अगर नेहा वास्तव में किसी बड़े नेटवर्क की कड़ी है तो नेटवर्क सामने आना चाहिए।

अगर वह पहली बार किसी दबाव या लालच में इस घटना में शामिल हुई है तो वह तथ्य भी सामने आना चाहिए।

और अगर उसका शादी वाला बयान सही है तो जांच को उसी निष्कर्ष तक पहुंचने का साहस भी दिखाना चाहिए।

जांच का उद्देश्य किसी पूर्वनिर्धारित कहानी को सही साबित करना नहीं, बल्कि सही कहानी तक पहुंचना होना चाहिए।

असली सवाल नेहा नहीं, वह व्यवस्था है जो शराब को बिहार तक पहुंचने देती है

नेहा झा का मामला अदालत में अपना रास्ता तय करेगा। आरोप साबित होंगे या नहीं, यह न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी।

लेकिन इस घटना ने बिहार की शराबबंदी के सामने एक बड़ा आईना जरूर रख दिया है।

यदि 75 लीटर विदेशी शराब फर्स्ट एसी के कूपे तक पहुंच सकती है, तो यह केवल एक युवती की कहानी नहीं है। यह उन रास्तों की कहानी है जिनसे शराब राज्य में प्रवेश कर रही है।

यदि पुलिस केवल नेहा को गिरफ्तार करके संतुष्ट हो जाती है तो एक व्यक्ति पकड़ा जाएगा, समस्या नहीं।

यदि जांच शराब के स्रोत से लेकर अंतिम खरीदार तक पहुंचती है तो शायद इस गिरफ्तारी का वास्तविक अर्थ निकलेगा।

शराबबंदी की सफलता का प्रमाण यह नहीं कि कितनी बोतलें पकड़ी गईं; असली प्रमाण यह है कि कितनी बोतलें बाजार तक पहुंचने से पहले ही सप्लाई चेन से बाहर हो गईं।

और इसीलिए नेहा झा प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि—

“नेहा कौन है?”

बल्कि यह है—

“नेहा तक शराब पहुंचाने वाला कौन है, नेहा से शराब लेने वाला कौन था और वह पूरा नेटवर्क आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है?”

जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, 75 लीटर शराब की बरामदगी केवल एक गिरफ्तारी की खबर रहेगी।

नेटवर्क का पर्दाफाश तभी होगा, जब पुलिस सूटकेस से आगे बढ़कर उस हाथ तक पहुंचे जो सूटकेस भरता है—और उस हाथ से भी आगे उस बाजार तक पहुंचे जो उसे खरीदता है।

 

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