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साहित्य

भारत का नववर्ष : 1 जनवरी नहीं, अपितु चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

सिवान (बिहार)

राष्ट्रीय अध्यक्ष — माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी

प्रस्तावना :

भारतीय संस्कृति केवल परंपराओं का संकलन नहीं, बल्कि समय, प्रकृति और चेतना के सूक्ष्म सामंजस्य पर आधारित एक सुव्यवस्थित जीवन-दर्शन है। इसी दर्शन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है नववर्ष की अवधारणा। आज प्रचलित 1 जनवरी को नववर्ष मानने की परंपरा भारतीय नहीं है। भारत का वास्तविक, शास्त्रसम्मत तथा प्रकृति-संगत नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है। यही तिथि भारतीय कालगणना, सांस्कृतिक चेतना और जीवन-दर्शन का मूल आधार है। भारत के विविध प्रांतों में यही तिथि विभिन्न नामों से मनाई जाती है। कहीं यह गुड़ी पड़वा है, कहीं उगादी, कहीं नवसंवत्सर, तो कहीं चेटीचंड। नाम भले अलग हों, पर भाव एक ही है—नवजीवन, नवचेतना और नवसंकल्प का आरंभ।

शास्त्रीय दृष्टि से नववर्ष का स्वरूप –
भारतीय शास्त्रों में समय को केवल गणना की इकाई नहीं, बल्कि सजीव तत्व माना गया है। वेद, पुराण और स्मृतिग्रंथों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि-आरंभ का दिवस बताया गया है। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की। अतः यह दिन केवल पंचांग की तिथि नहीं, बल्कि सृष्टि-चक्र के आरंभ का प्रतीक है। विक्रम संवत, शक संवत तथा अनेक प्राचीन भारतीय संवत्सरों का प्रारंभ इसी तिथि से होता है। धर्मशास्त्रों में इसे सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना गया है, जिसमें व्रत, संकल्प, यज्ञ, अध्ययन, दीक्षा और नवीन कार्य आरंभ करना विशेष फलदायी बताया गया है। यह दिन कालचक्र की शुद्धि और जीवन के नवोन्मेष का प्रतीक है।

वैज्ञानिक दृष्टि से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्व –

वैज्ञानिक दृष्टि से भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अत्यंत तर्कसंगत है। यह समय वसंत ऋतु का चरम बिंदु होता है, जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करता है। इस परिवर्तन के साथ ही प्रकृति में अद्भुत जागरण दिखाई देता है।

इस काल में दिन और रात लगभग संतुलित होते हैं। वृक्षों में नवपल्लव फूटते हैं, पुष्प खिलते हैं, कृषि-चक्र सक्रिय होता है और जीव-जंतुओं में नवीन ऊर्जा का संचार होता है। मानव शरीर भी इस ऋतु परिवर्तन से प्रभावित होता है। जैविक स्तर पर रोग प्रतिरोधक क्षमता सुदृढ़ होती है तथा मानसिक उत्साह में वृद्धि होती है। इसके विपरीत 1 जनवरी शीत ऋतु के मध्य आता है, जब प्रकृति निष्क्रिय अवस्था में रहती है। उस समय न तो नवीन सृजन का संकेत होता है और न ही जैविक नवचक्र का। इसलिए उसे प्राकृतिक नववर्ष कहना वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित नहीं ठहरता।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से नववर्ष की अवधारणा
मानव मन प्रकृति के साथ गहरे स्तर पर जुड़ा होता है। जब चारों ओर नवजीवन, हरियाली और उल्लास का वातावरण होता है, तब व्यक्ति के भीतर स्वतः सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इसी मनोवैज्ञानिक अनुकूलता का समय है।

इस अवसर पर घरों की स्वच्छता, स्नान, पूजा, व्रत, नीम और गुड़ का सेवन जैसे संस्कार मन को अनुशासन, संतुलन और स्वीकार भाव सिखाते हैं। जीवन में सुख-दुःख दोनों को समभाव से ग्रहण करने की यह सांकेतिक शिक्षा अत्यंत गहन मनोवैज्ञानिक संदेश देती है। इसके विपरीत आधुनिक नववर्ष का उत्सव प्रायः क्षणिक उत्तेजना, उपभोग और दिखावे तक सीमित रह जाता है। इससे मानसिक शुद्धि के स्थान पर विक्षेप और थकान उत्पन्न होती है। भारतीय नववर्ष मन को स्थायित्व, संयम और आत्मबोध की ओर प्रेरित करता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य –  औपनिवेशिक प्रभाव और सांस्कृतिक विस्मृति

1 जनवरी को नववर्ष मानने की परंपरा रोमन सभ्यता से आई है। जूलियस सीज़र द्वारा निर्मित कैलेंडर तथा बाद में ग्रेगोरियन कैलेंडर के माध्यम से यह तिथि यूरोप में प्रचलित हुई। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने इसे भारत में प्रशासनिक रूप से लागू किया। धीरे-धीरे यह तिथि सामाजिक व्यवहार में भी प्रवेश करती चली गई और भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं से दूर होता चला गया। अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था ने इस मानसिकता को और मजबूत किया, जिससे अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को पिछड़ा और अप्रासंगिक समझने की प्रवृत्ति विकसित हुई। वास्तव में यह सांस्कृतिक विस्मृति नहीं, बल्कि मानसिक दासता का परिणाम थी, जिससे अब बाहर निकलना समय की आवश्यकता है।

आधुनिक समीक्षात्मक दृष्टि 
परंपरा और आधुनिकता का समन्वय आधुनिक होना परंपरा का विरोध नहीं है। सच्ची आधुनिकता वही है, जो अपनी जड़ों से जुड़कर आगे बढ़े। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ऐसा ही अवसर है, जहाँ विज्ञान, संस्कृति और चेतना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। यह दिन पर्यावरण के अनुकूल है, मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल है, सामाजिक समरसता को बढ़ाता है और राष्ट्रीय आत्मगौरव को पुष्ट करता है। इसके माध्यम से समाज में सकारात्मकता, अनुशासन और सांस्कृतिक निरंतरता का संचार होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि भावनात्मक और बौद्धिक रूप से भी अपने नववर्ष को पहचानें और अपनायें।

उपसंहार –

भारत का नववर्ष कोई तिथि मात्र नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। यह आत्मा के नवोन्मेष, चेतना के पुनर्जागरण और संस्कृति के पुनर्स्मरण का पर्व है। जब हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष के रूप में स्वीकार करते हैं, तब हम अपने अतीत से जुड़ते हैं, वर्तमान को संतुलित करते हैं और भविष्य को संस्कारित बनाते हैं।

आइये, हम संकल्प लें कि आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सनातन परंपरा को भी आत्मसात करेंगे। हम वैश्विक बनेंगे, पर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटेंगे नहीं। यही सच्चा नववर्ष-बोध है और यही भारत की आत्मा है।

 

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