——-नीरव समदर्शी
भागलपुर में हाल ही में अडानी ग्रुप को एक रुपये वार्षिक लीज पर 1050 एकड़ जमीन देने का मामला जबरदस्त विवाद का कारण बना। अब इसी कड़ी में बिहार सरकार ने रोजगार सृजन और बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है, जिसका नाम ‘बिहार इंडस्ट्रियल निवेश प्रोत्साहन पैकेज 2025’ रखा गया है। इस पैकेज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकार निवेशकों को सिर्फ 1 रुपये के टोकन अमाउंट पर जमीन उपलब्ध करा रही है। इसके लिए मार्च 2026 तक का समय निर्धारित किया गया है।
इस एक फैसले से अडानी ग्रुप को दी गई जमीन संबंधी पूरी बहस भी जैसे स्वतः समाप्त हो गई।
इसी तरह, पटना में मरीन ड्राइव के किनारे पुरानी सिटी रोड के समानांतर एक विशाल देवर/रिंगबाँध हुआ करता था। बरसातों में पानी दीवार तक पहुंच जाता था और हजारों लोग हर साल यह नज़ारा देखने आते थे। कहा जाता है कि 50–100 वर्ष पहले तक मरीन ड्राइव से पुरानी सड़क के बीच ही बस्तियां थीं—मंदिर, गुजरा, कुरजी और आसपास के अधिकांश मोहल्लों की नींव उसी पुराने भू-भाग में पड़ी थी।
फिर 2003–04 के बाद, जब नीतीश कुमार की सरकार बनी, गंगा धीरे-धीरे पीछे खिसकती चली गई। उस समय लालू यादव ने टिप्पणी की थी कि सरकार के पापों से गंगा रूठ गई है। धीरे-धीरे वही क्षेत्र पूरी तरह खुला मैदान बन गया और देखते ही देखते गंगा दीवार के भीतर सैकड़ों अपार्टमेंट खड़े कर दिए गए। इन निर्माणों की वैधता पर स्थानीय स्तर पर सवाल भी उठे और पूरा मामला कई सौ करोड़ रुपये का प्रतीत होता है।
लेकिन जब नीतीश कुमार का मरीन ड्राइव ड्रीम प्रोजेक्ट आया, तो इस पूरे विवाद पर जैसे पर्दा पड़ गया। भले ही इस प्रक्रिया को कानून के दायरे में खड़ा करना कठिन हो, लेकिन यह स्पष्ट होता है कि सरकार की नीयत खास लोगों के प्रति ही उदार दिखाई देती है।
नीतीश कुमार ऐसे ‘खेलों’ के बेहद निपुण खिलाड़ी रहे हैं। यही कारण है कि ईडी के इस दौर में भी वे किसीराजनीतिक या कानूनी दबाव से कोसों दूर नजर आते हैं।






