सपनों का कर्ज़दार मुखर्जी नगर

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प्रियांशु त्रिपाठी

किचन से भी छोटे कमरे में जिस्म तपाते हुए, बिस्तर की सीमा से पैर बाहर किये, एन.सी.आर.टी को तकिये के सिरहाने किटाये हुए कुछ परिंदें बड़ी उड़ान के सपने सजाते है, उस जगह को आम भाषा में मुखर्जी नगर तो कहा जाता है मगर ये बस एक क़सबा नहीं है, ये छात्रों के लिए एक बरगद की छत्रछाया सा है जहाँ सुबह धूप की छिटकन से नींद नहीं खुलती है क्योंकि धूप की छिटकन आने लायक खिड़कीयुक्त आशियाना सबके जेब से झांक रहे पैसे में नहीं मिल पाता । मगर नींद तो खुल जाती है और ऐसी खुलती है जो उठते घड़ी के काँटों पर संवार हो जाते हैं और सपनों को हकीकत में पिरोने की कोशिश करते हैं । आज वहीं जाना को कदम उत्सुक थे । मैं, तोशवंत और अरविंद आज घर रूकने को थे इसलिए घुमक्कड़ मन घुमने को तैयार था । सौरभ का कॉल कल रात ही आ गया था कि तुम सब कब आ रहे हो मिलने । हमने में हामी भर दी थी । वहीं आज 11 बजे जाने का पिलान हुआ । समय 11 बजे तय हो और आप 11 बजे पहुँच जाये ये कभी मुमकिन नहीं है जब आपके एक काबिल दोस्त को पबजी का लत हो ।

परिणाम वही हुआ 11 बजे तो घर से ही निकलते है हम सब । नीचे बगल वाले गली में वासर के पास कपड़े भी देने थे मैं और तोशवंत कपड़े देने चले गए और अरविंद रूम में मास्क ढूँढ रहे थे । मास्क अमूमन मिल जाता है मगर किशभ कल रात कमरे की साफ सफाई किये थे इसलिए कहीं संभाल कर मास्क को रख दिये थे लॉकर रूम टाइप । बाकी वो कामयाब होते है और हम तीनों फिर मेट्रो स्टेशन की ओर निकल पड़ते हैं । रास्ते में तोशवंत को याद आता है कि उन्हें सैंडल सिलवाना है वरना उन्हें चलने में तकलीफ़ होगी। मेट्रो के पास बैठे चच्चा से पुछते है कि चाचा कितना लगेगा सैंडल सिलने का । चच्चा हमें देख कर अंदाज़ा लगा चूके थे कि बहरी का लग रहा है ई लईकन, ये सोचते हुए वो कहते है  50 रूपया । हम मन में सोचे इ नया देंगे का इ सैंडलवा के बदले । फिर थोड़ा कम करते है मगर वक्त बढ़ा देते है कहते है आधा घंटा लगेगा, एक तो ऐसे ही लेट ऊपर से इ, तोशवंत को बोले चलो शाम में सिला लेंगे । तभी एक और चच्चा वहीं बैठे मिल जाते है और वो कम वक्त में ही काम कर देते है मगर पैसे कम नहीं करते हैं ।

मेट्रो परिसर में अंदर जाते ही एक बंदूक सा यंत्र हाथ पर भिड़ा दिया जाता है उसमे टेमपरेचर पता किया जाता है, अंदर से हाई तो था ही पर उसमे नार्मल आ गया । वहीं हार्पिक बोतल में सेनिटाइजर और पानी फेट के रखा जाता है, जो हमारी हथेली पर हैप्पी होली टाइप मारा जाता है । हम भी सेनिटाइजर से नहाकर ऊपर सीढ़ी की तरफ बढ़ते है  और देर हो जाने के कारण चलने वाली सीढ़ी पर भी चल चल के तनीक जल्दी ऊपर टपक जाते हैं । बैग ना होने के कारण बैग को रनींग स्लीपर में नहीं डालना पड़ता है । हमें बस स्कैन किया जाता है । पुलिस वाले सर अकसर कहते हैं पर्स हाथ में निकाल लो और हम रोज़ छोड़ देते है । काला कोर्ट में रहने पर चेकिंग कम होता है वकीलों का, पर आम कपड़ो में तो पीछे भी घुमिये । खैर वो उनकी भी जॉब है और हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी भी । हम तीनों अपना कार्ड स्वाइप करके बढ़ते हैं और मेट्रो में लटक जाते हैं (नोट:- सीट नहीं मिला बैठने को) । मुझे ब्लू ड्रेस वाली मैडम अच्छी लगती है मगर मेट्रो कर्मचारियों को ये बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी क्योंकि जनकपुरी आज जल्दी आ गया और मैडम उतर गई जनकपुरी ही । खैर कोई नहीं हम उस ओर आज जा रहे थे जहाँ सपने बनते और टूटते रहते हैं, शुरूआत यही हो चुकी थी । बात करते रुकते रूकाते हम राजीव चौक उतरते है और जी टी वी रोड जाने वाली मेट्रो पर बैठने या लटकने निकल पड़ते हैं, तोशवंत सर के लीडरसीप में आज पहली बार हम सब दूसरे  मेट्रो पर बैठ गये जो विपरीत जा रही थी, कोई नहीं अगले स्टेशन पर उतरकर बदल लिये, मेट्रो का यही तो फायदा है । बाकी ठीक ठाक ठके मूड में जी टी वी रोड उतरकर हम सब बाहर निकलते है । अनगिनत ऑटो वाले की चिल्लाहट के बीच एक सन्नाटा में पसरा आवाज़ सुनाई देता है “बत्रा सिनेमा”।

बत्रा सिनेमा का किस्सा नीलोत्पल मृणाल के डार्क हॉर्स में तो पढ़ा है जाना है मगर आज जीना भी था । अग्रवाल के पास तोशवंत रोकने को बोलते है और हम वहाँ उतरकर सौरभ के रूम पर जाने को तैयार । थोड़ी धूप, सर्द हवा, मुखर्जी नगर का रोड़, घर का शुद्ध खाना की गाड़ी, वैष्णो भोजनालय का बोड़, चाय की दुकान, पान की गुमटी, दीवार पर चिपके और रोड़ पर बिखड़े कुछ नई बैच के इश्तिहार, पीठ पर बैग लिए और कदम में हिम्मत बाँधे युवा ये सुनिश्चित कर चुके थे कि ये जगह मामूली है नहीं, जहाँ हर दुसरे बिल्डिंग में एक कोचिंग या मेस या पी जी तो था ही । हम सौरभ के रूम पर पहुँचते है और हम वहाँ इंतज़ार कर रहे ताले को देखते हैं, मन में गाली का भाव कि साला बुलाकर कहाँ गायब हो गया । तोश फोन करता है और पूछता है- कहाँ है रे, बुलाकर कहाँ चल गया । सौरभ बोलता है भाई बत्रा के पास है आ रहे है । सौरभ बगैर देरी के पहुँचता है और टाला खुलते ही हम दोस्त अपनी बातों में घुल जाते हैं । बैचलर रूम पर हम कुछ खाने पीने की उम्मीद कम रखते हैं पर सौरभ भाई ने बिस्किट और मिक्चर का पैकेट रखा था अलमारी में । बाकी खाने से पहले बालकनी से दिख रहे रहे नजारे को जीने का मन था । वो टावर बिल्डिंग जिसकी उच्चाई मुखर्जी नगर में सबसे ज्यादा होते हुए भी बच्चों के हौसलों से नीचा लगता है । बत्रा सिनेमा भी बालकनी से दिखता है पर तोशवंत ने कोई और बिल्डिंग को बत्रा बनाकर मेरे सामने पेश कर दिया जिसे महसूस करना शुरू कर चूके थे तभी सौरभ एक और सपना टोड़ते हुए कहते हैं अरे ये बत्रा जैसा है, बत्रा नहीं है । असली पुराना बत्रा वो है जो वहाँ दिख रहा था । मुझे मेरे सपने का प्लाट तोशवंत से सौरभ की ओर बदलना पड़ता है । खैर अब बिस्किट और मिक्चर की बारी थी । हम तीन असभ्य लोग सभ्यता से पूरा बिस्किट और मिक्चर चट कर जाते हैं, सौरभ मन में कुछ सोचा तो होगा पर क्या ही कर सकते हैं भूख ज्यादा लगी  थी । वक्त की सीमा को लांघते हुए हम दोस्ती निभा रहे थे, तभी निकलने का मन बनता है और नीचे उतरकर सर्दी हुए मन को ओरीओ सेक पीना पड़ा वींथ आइसक्रीम । मजा आया क्योंकि किसे ने ठीक कहा है लोहा लोहे को काँटता है । उसके बाद संवारी पेट भरने छोले बटूरे की दुकान पर पहुँचते है और पेट भर खाते है ।  आज इतना वक्त बिताने पर मुखर्जी नगर के बारे में ये अंदाजा तो हो गया था कि यहाँ सपनों को हकीकत बनाने की कोशिश होती है कुछ सफल कुछ असफल, और सबसे बड़ी खूबी ये है कि यहाँ की असफलता भी आपको सफल व्यक्ति बनाकर छोड़ती है । दिमाग में बहुत सारे विचार तो पनप रहे थे जिन्हें आगे भी शब्दों में पिरोया जा सकता था मगर मैंने दिमाग को परे कर दिल से काम लिया जैसे आप सब दिल से इस सफ़र को पढ़ रहे होंगे, आप को आज मुखर्जी नगर की इन्हीं गलियों में छोड़ते है, अभी और जायका आने वाले दिन में आप सब से साझा होंगी, अगर एक दिन में सब कुछ खिला दिया तो पेट खराब हो जायेगा और आप पेट को अंडरइस्टिमेट नहीं कर सकते है ।

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